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सावित्रीबाई फुले – नारी आंदोलन की मशाल भी मिसाल भी

March 10, 2017 11:56 am by: Category: खबर खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

savitribai-phule

काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो

ज्ञान के बिना सब खो जाता है,

ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है

इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो,

तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो,

ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो।

शिक्षा हासिल करने और जातिवाद के बंधनों से मुक्त होने का संदेश देने वाली यह कविता मूल रूप से मराठी में हैं। इसे लिखा है देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले ने। सावित्री बाई फुले ही वो महिला हैं जिन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के सहयोग से देश में महिलाओं की शिक्षा के लिये अलख जगाई और जातिवादी बंधनों को तोड़ने के प्रयास किये। आज पूरा देश इस महिला शिक्षक और महिलाओं की प्रेरणा बनी सावित्री फुले का जन्म महोत्सव मना रहा है।

उनका जन्म महाराष्ट्र के नयागांव में 3 जनवरी 1831 को हुआ था। 9 साल की अल्पायु में उनका विवाह 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हुआ। दोनों ही आगे चलकर ऐसे समाजसुधारक हुए जिन्हें हमेशा याद किया जायेगा। महिला और दलित उत्थान के लिये काम करने वालों में सबसे पहला नाम इन्हीं का लिया जायेगा। महिलाओं की शिक्षा के लिये पहला महिला स्कूल खोलने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। 1848 में पुणें में इन्होंने पहले महिला स्कूल की स्थापना की। समाज में सावित्री फुले का विरोध भी हुआ। कहते हैं वे अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थी क्योंकि जब वे कन्याओं को पढ़ाने के लिये जाती तो लोग उन पर कीचड़, गोबर आदि फेंकते थे। फिर वे स्कूल पंहुचकर अपने कपड़े बदलती और बालिकाओं को पढ़ाती। किसी तरह का विरोध, बहिष्कार उन्हें अपने पथ से डिगा न सका। सामाजिक रूढ़ियों में ज्योतिराव फुले उनके हमसफर, उनके मार्गदर्शक हमेशा बने रहे। वे किसी भी तरह के रंग, लिंग या फिर जात-धर्म के भेद को नहीं मानती थी। उन्होंने विधवा महिलाओं के अधिकारों की आवाज़ को भी बुलंद किया। शिक्षा के साथ-साथ महिलाओं की सेहत पर भी उनका बराबर ध्यान रहा उन्होंनें बाल हत्या प्रतिबंधक गृह नाम से एक सैंटर भी खोला जिसमें वे महिलाओं का उपचार करती थी। विशेषक उत्पीड़ीत महिलाओं का। इसी काम को ज्योतिराव के दत्तक पुत्र यशवंतराव ने भी डॉक्टर बनकर उनका हाथ बंटाया। दरअसल एक बार एक गर्भवती महिला को आत्महत्या करने से ज्योतिराव ने रोका, महिला ने उनसे अपने बच्चे को उनका नाम देने की कही, इस पर ज्योतिराव और सावित्री फुले ने महिला को अपने पास रखा और उसकी सेवा की, इस महिला की कोख से जन्मे बच्चे को ही ज्योतिराव ने यशवंतराव नाम दिया जो आगे चलकर डॉक्टर बने। पुणे में खोले अस्पताल में वे मरीजों सेवा करते यहीं पर उन्हें भी बिमारी ने अपने लपेटे में ले लिया और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले – कुछ महत्वपूर्ण बातें

वह देश की पहली महिला शिक्षक और नारी आंदोलन की पहली नेता थी, वे कवयित्री भी थीं।

उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिये 18 स्कूल खोले, पहला और अठारहवां स्कूल पुणे में खोला।

पीड़ित महिलाओं के लिये बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना उन्होंने 28 जनवरी 1853 में की।

वे छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ अपने हमसफर ज्योतिराव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी।

1890 में ज्योतिराव फुले के देहांत के बाद भी वे उनके सपनों को साकार करने में मृत्युपर्यंत लगी रहीं।

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