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उच्चतम न्यायालय, दीवाली-पटाखे, परंपरा और चेतन

क्या परंपरा के विषय पर बुद्धिजीवी वर्ग भी भटक सकता है

October 12, 2017 3:22 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

क्या है परंपरा ? हमारे देश में परंपरा के नाम पर बहुत सारी विसंगतियां रही हैं । दलितों के साथ होने वाला अन्याय-अत्याचार परंपरा का ही हिस्सा था। स्त्री की अधिकारहीनता और उसके समग्र अस्तित्व को नकारकर उसको मात्र देह रूप में देखना और भोग की वस्तु समझना – यह भी परंपरा का हिस्सा था । अशिक्षा, कुपोषण, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, गरीबी, भ्रूण हत्या, पोलियो आदि बीमारियां, इत्यादि – यह सब भी परंपरा का हिस्सा थे और अस्वच्छता- प्रदूषण भी हमारी परंपरा का हिस्सा था या है। हमारी परंपरा ने इन समस्त विसंगतियों का वहन शताब्दियों तक किया। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात आधुनिक सभ्य भारतीय समाज ने इन समस्त विसंगतियों के विरुद्ध समय-समय पर मोर्चा खोला, इन समस्त विसंगतियों के विरुद्ध कठोर निर्णय लिए गए, नियम-अधिनियम बनाए गए और अधिकांश भारतीय जनता ने इन नियमों का स्वागत किया।

अब माननीय उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण की रोकथाम की दृष्टि से एक निर्णय लिया कि दीपावली के अवसर पर दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध होगा लेकिन कुछ लोग इससे असहमत हैं जैसे चेतन भगत। व्यापारी वर्ग अथवा सामान्य मनोरंजन पिपासु जन की असहमति समझ में आती है लेकिन एक लेखक का इस उत्तम निर्णय के विरुद्ध जाना यह कहकर कि यह निर्णय परंपरा के विरुद्ध है, समझ में नहीं आता । हां अब ये अवश्य समझ में आता है कि क्यों अक्सर यह कहा जाता है – पॉपुलर लिटरेचर और मुख्यधारा लिटरेचर में बहुत बड़ा अंतर है। अब यह भी समझ में आता है कि पॉपुलर लिटरेचर के लेखकों के पास गंभीर सामाजिक दृष्टि और गहन दार्शनिक दृष्टि का अभाव होता है । कदाचित उनके दृष्टिकोण पर अपनी सस्ते विषय पर लिखी गई किताब की सफलता और उससे होने वाली आय ही हावी रहती है । वे इसके परे कुछ देख और समझ नहीं पाते। मुझे यह भी लगता है कि पॉपुलर लिटरेचर के लेखकों के पास परंपरा, संस्कृति और इतिहास के विशेष ज्ञान का अभाव होता है। क्या चेतन भगत यह जानते हैं कि पटाखों का आविष्कार चाइना ने किया और रामायण विशुद्ध भारतीय कथा है अर्थात राम का चाइना से कुछ लेना-देना नहीं , अर्थात राम के अयोध्या आगमन के समय भारत में पटाखों का प्रचलन नहीं था क्योंकि पटाखों का पहला प्रयोग भारत में सातवीं-आठवीं सदी में हुआ। फिर कैसे पटाखे भारत की परंपरा का हिस्सा हुए और दीपावली से पटाखों का संबंध कैसे स्थापित हुआ ? क्या गलत सामाजिक प्रचलन को परंपरा का नाम दिया जा सकता है? पटाखों के प्रतिबंध पर चेतन भगत का रुदन ऐसा ही है जैसा कि अंग्रेजी राज्य में सती प्रथा, देवदासी प्रथा, नवजात बालिका-वध, बाल-विवाह, विधवा विवाह, इत्यादि कुप्रथाओं के विरुद्ध सख्त नियम बनाए जाने के विरोध में तत्कालीन हिंदू समाज ने यह कहते हुए विरोध किया था कि अंग्रेज भारत की परंपराओं के साथ छेड़छाड़- खिलवाड़ कर रहे हैं, उन्हें भारत की परंपराओं का ज्ञान नहीं है।

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक और अभूतपूर्व व सराहनीय निर्णय दिया-18 वर्ष से कम आयु की लड़की से विवाह संबंध बलात्कार के समान है। क्या चेतन भगत इसे भी परंपरा के विरुद्ध फैसला कहेंगे क्योंकि हिंदुस्तान के बहुत सारे तबकों में 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह होता है, इसे अच्छा माना जाता है और ऐसा शताब्दियों से होता आ रहा है अर्थात यह परंपरा का हिस्सा है!!!

यद्यपि संदर्भ पटाखे, परंपरा और चेतन भगत का है तथापि मैं इस संबंध में एक और एंगल भी लेना चाहता हूं (संक्षिप्त में)। इधर-उधर पत्रिकाओं या अखबारों में छपे अपने लेखों में चेतन किंचित प्रगतिशील नजर आते हैं। इस अर्थ में कि उन्हें वर्तमान भारत में चल रही भगवा राजनीति अथवा हिंदुत्ववादी चश्मे से विरोध है। किंतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर की गई अपनी टिप्पणी में वे अपनी विचारधारा से भटक गए और अपने ट्वीट में दीपावली की तुलना में मोहर्रम और बकरीद का भी असहिष्णुता दर्शाने वाला जिक्र कर गए। प्राय: अपने समस्त लेखन में प्रेम के मात्र शारीरिक तत्व का ही वर्णन करने वाला लेखक प्रेम, सौहाद्र और मानवता की मूल आत्मा व दर्शन की समझ नहीं रखता और ऐसा व्यक्ति अपने आत्मपुष्ट ज्ञान व सरलता से प्राप्त सफलता के मोह में फंसा भ्रमित हुआ रहता है । वह अपने बाहरी परिचय को ही सत्य समझने लगता है लेकिन उसका अवचेतन उसके मूल सत्य को शब्द-आवाज़ दे ही देता है।  इसलिए चेतन भगत यह भी नहीं समझ पाए कि अपने ट्वीट में दीपावली की तुलना में क्रिसमस का उद्धरण देते हुए यह कहना कि बिना क्रिसमस ट्री के क्रिसमस कैसा, वास्तव में उनके उपन्यासकार व्यक्तित्व पर प्रश्न खड़ा करता है। यह बहुत संभव है कि ग्लोबल वार्मिंग के युग में जल्द ही क्रिसमस ट्री को काटने पर भी रोक लगा दी जाए और यह निश्चित रूप से क्रिश्चन आस्था पर प्रहार नहीं होगा अपितु प्रकृति के कल्याणार्थ होगा ।

बरहाल, न्यायापालिका परंपराओं के संदर्भ में फिल्टर का काम करती है। उसके उचित निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिए। पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि दिल्ली में दीपावली के अवसर पर पटाखों से होने वाला प्रदूषण लगभग पूरे वर्ष के प्रदूषण के बराबर होता है। उच्चतम न्यायालय निश्चित रुप से इस थ्योरी से परिचित होगा जिसका परिणाम यह निर्णय है। मैं इस निर्णय से सहमत हूं।

उच्चतम न्यायालय, दीवाली-पटाखे, परंपरा और चेतन Reviewed by on . क्या है परंपरा ? हमारे देश में परंपरा के नाम पर बहुत सारी विसंगतियां रही हैं । दलितों के साथ होने वाला अन्याय-अत्याचार परंपरा का ही हिस्सा था। स्त्री की अधिकारह क्या है परंपरा ? हमारे देश में परंपरा के नाम पर बहुत सारी विसंगतियां रही हैं । दलितों के साथ होने वाला अन्याय-अत्याचार परंपरा का ही हिस्सा था। स्त्री की अधिकारह Rating: 0

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