Tuesday , 26 September 2017

Home » खबर खास » सेल्फि की लत कुछ सही काफी गलत

सेल्फि की लत कुछ सही काफी गलत

July 25, 2017 12:33 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में पीएचडी कर रहीं ओलिविया रिमेस ने एक आलेख लिखा विषय था नार्सिसिज्म जिसे हिंदी में हम आत्ममुग्धता कह सकते हैं। आत्ममुग्धता का अभिप्राय है स्वयं पर मोहित होना, स्वयं से प्यार करने लगना। वैसे ऊपरी तौर पर स्वयं से प्यार करना या स्वयं पर मुग्ध होना कोई खराब बात नहीं लगती लेकिन शोध बताते हैं कि एक समय के पश्चात यह भयंकर बिमारी का रूप भी ले लेती है। व्यक्ति को समाज से अलग-थलग कर देती है। मनुष्य जो कि सामाजिक प्राणि कहा जाता है वह आत्मकेंद्रित हो जाता है। सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचने लगता है। सेल्फि का बढ़ता चलन आत्ममुग्धता की बिमारी को महामारी में तब्दील करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

सेल्फि और आत्ममुग्धता

सेल्फि यानि एक ऐसा चित्र जो स्वयं द्वारा लिया जाता हो, वर्तमान में फ्रंट और रियर कैमरा वाले फोन से सेल्फि और ग्रुपी छवियां लेने में क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं। इन फोटोज को तत्काल प्रभाव से सोशल साइट्स फेसबुक, इंस्टाग्राम पर फेंक दिया जाता है और जिसको जितने ज्यादा लाइक मिले जिसको जितना ज्यादा शेयर किया जाये, देखा जाये उसकी सेल्फि उतनी ही हिट मानी जाने लगती है। लेकिन सेल्फि सिर्फ अपने आपकी छवि को दिखाने का जरिया मात्र नहीं है बल्कि अपने आप को बेहतर दिखाने के चक्र में जान तक के जोखिम उठाये जाने लगते हैं। उस अवस्था में सेल्फि एक दु:स्वपन भी बन जाती है।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय की शोधार्थी रिमेस के लेख को हिंदी में सत्याग्रह डॉट सक्रॉल डॉट इन पर प्रकाशित किया गया था। उसके अनुसार आत्ममुग्धता उस समय खतरनाक होने लगती है जब लोग आत्मकेंद्रित होने लगते हैं और दूसरों की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होते हुए अपनी ज्यादा से ज्यादा तारीफ और स्वीकार्यता चाहने लगते हैं। यदि उन पर ध्यान न दिया जाये तो वे गलत संगत में भी पड़ जाते हैं। यहां तक इस बात से अवसाद ग्रस्त भी हो जाते हैं। सेल्फि के संदर्भ में इसे बखूबी समझा जाता है। कितने किस्से सुनने में मिलते हैं कि फलां ने फलां कि फोटो को लाइक नहीं किया तो उसने उसे अपनी फ्रेंड लिस्ट से बाहर फेंक दिया, या किसी प्रेमिका के प्रेमि ने या प्रेमिका ने प्रेमी की तस्वीर को लाइक नहीं किया तो इसी कारण दोनों की आपस में अनबन हो गई। यह सेल्फि के प्रति अपना मोह ही है। यहीं से समझ लेना चाहिये कि ख़तरे की घंटी भी बजनी शुरु हो गई है।

भारत में होती हैं सबसे ज्यादा सेल्फिग्रस्त मौतें

हद तो तब हो जाती है जब लोग सेल्फि से सनक तक का सफर तय करने लगते हैं। अकेले भारत में ही 33 करोड़ लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से यदि माना जाये कि आधे लोग भी सेल्फि को प्राथमिकता देते हैं तो संख्या कम नहीं है। सेल्फि के प्रति यह सनक इतनी जबरदस्त होती है कि आप अपनी जान की परवाह ही नहीं करते। हाल ही में राजस्थान के चार लड़के दमन दीव के एक बीच पर सेल्फि के चक्कर में समुद्र की लहरों में बह गये एक को तो जैसे तैसे बचा लिया गया लेकिन बाकि का अभी तक कोई सुराग नहीं लगा है।

दुनिया भर में सेल्फि के प्रति दिवानगी बढ़ती जा रही है लेकिन मरने वालों की संख्या भारत में सबसे ज्यादा है 2014 से 16 के बीच में ही सेल्फि से मरने वालों की संख्या 72 के करीब है। जबकि अन्य देशों में यह आंकड़ा 8 या 9 का है।

बाज़ार के लिये फायदेमंद है सेल्फि की लत

बाज़ार सेल्फि की कीमत को बखूबी समझ रहा है इसलिये उसे बेहतर बनाने के फीचर के साथ ही स्मार्ट फोन मार्किट में उतारे जाते हैं, विज्ञापनों में खूब दिखाया जाता है कि फलां फोन से बेहतर सेल्फि ली जा सकती है, सेल्फि ही नहीं ग्रुप सेल्फि भी अच्छे से ली जा सकती है, ग्रुप में भी यदि आप चाहें तो स्वयं पर फोकस कर तस्वीर ले सकते हैं।

कुल मिलाकर वर्तमान के माहौल और सेल्फि के प्रति बढ़ रही सनक को मनोरोग की श्रेणी रखा जा सकता है। नार्सिज्म के एक रूप में उसे देखा जा सकता है। सत्याग्रह पर ही आत्ममुग्धता की इस अवधारणा के इतिहास को 2000 साल पुराना बताया गया है जिसकी एक खूबसूरत कहानी भी पेश की गयी है “नार्सिसिज्म शब्द की उत्पत्ति तकरीबन 2000 साल पुरानी है. उस समय ग्रीस के साहित्यकार ओविड ने अपनी रचना लीजेंड ऑफ नार्सिसस में एक खूबसूरत शिकारी की कहानी लिखी थी जो एक दिन पानी के सोते में अपना प्रतिबिंब देख लेता है और उसके प्यार में पड़ जाता है. यह शिकारी अपनी ही खूबसूरत छवि से इस कदर मुग्ध हो जाता है कि सोते का किनारा नहीं छोड़ पाता और आखिर में यहीं अपनी जान दे देता है. इस जगह पर एक फूल खिलता है जिसे नार्सिसस कहा जाता है. इसी से ‘नार्सिसिज्म’ शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है” सेल्फि इसी अवधारणा का एक अंश है या कहें शिकारी आज सेल्फि लेने वाला है और पानी का सोता हमारा स्मार्ट फोन हो गया है। अपने पर मुग्ध हुए हम स्मार्टफोन रूपी सोते का किनारा छोड़ने को तैयार नहीं है जिस कारण अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। अपनी इस आभासी दुनिया को छोड़कर अपने दोस्तों के साथ घुमिये फिरिये नई नई जगहों की सैर करिये लोगों से मेल जोल बढ़ाईये क्योंकि मनुष्य के एक सामाजिक प्राणी न कि वह इन्टरनेट की आभासी दुनिया का आभासी प्राणी।

सेल्फि की लत कुछ सही काफी गलत Reviewed by on . यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में पीएचडी कर रहीं ओलिविया रिमेस ने एक आलेख लिखा विषय था नार्सिसिज्म जिसे हिंदी में हम आत्ममुग्धता कह सकते हैं। आत्ममुग्धता का अभिप्राय यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में पीएचडी कर रहीं ओलिविया रिमेस ने एक आलेख लिखा विषय था नार्सिसिज्म जिसे हिंदी में हम आत्ममुग्धता कह सकते हैं। आत्ममुग्धता का अभिप्राय Rating: 0

Leave a Comment

scroll to top