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पसीने के बल सृजन

December 29, 2017 4:14 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

किसी व्यक्ति को बढ़ी दाढ़ी व घिसे कपड़ों में ऊंटगाड़े पर बैठ नित खेत जाते देख कौन कह सकता है कि यह राजस्थानी का बड़ा कथाकार और कवि है। पर यह सच है। रामस्वरूप किसान राजस्थानी कथा-साहित्य में एक बड़ा नाम है।

रामस्वरूप किसान का जन्म 14 अगस्त 1952 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला अंतर्गत परलीका गांव में हुआ। स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत किसान ने सरकारी नौकरी न कर व्यवसाय के रूप में खेती को चुना। वे असल में किसान हैं। नाम के आगे लगा किसान इनवर्टेड कोमाज में नहीं है। पैंसठ की उम्र में किसान आज भी खेत में हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं। उनके यहां सृजन व श्रम एकमेक है। लेखन पसीने के बंट निकलता है। जानकारी के तौर पर एक बात और कि रामस्वरूप किसान एक सीमान्त काश्तकार हैं। किसी भाषा का एक बड़ा राइटर जब उम्र के तीसरे पड़ाव में भी खेती जैसा कठोर कर्म करते हुए सृजनरत हो तो यह एक अजूबे से कम नहीं है। किसी व्यक्ति को बढ़ी दाढ़ी व घिसे कपड़ों में ऊंटगाड़े पर बैठ नित खेत जाते देख कौन कह सकता है कि यह राजस्थानी का बड़ा कथाकार और कवि है। पर यह सच है। रामस्वरूप किसान राजस्थानी कथा-साहित्य में एक बड़ा नाम है। इसका कारण उनकी लोक-संप्रक्ति है। वे लोक व श्रमशील वर्ग को दूर से देखने वाले न होकर स्वयं उसका हिस्सा हैं। इस कारण वे अपना भोगा हुआ यथार्थ ही लिखते हैं। किसान ने अपनी कहानियों में ग्रामीण जीवन का बेजां दोहन किया है। वे ग्रामीण जीवन व संस्कृति के मास्टर हैं। उनके मौलिक चिन्तन को पढ़कर उन्हें किसी यूनिवर्सिटी के दर्शनशास्त्र के व्याख्याता से कम नहीं आंका जा सकता। किसान के वैचारिक स्तर व चिन्तन पर इस तरह की अनेक टिप्पणियां लेखक लोग करते हैं।

रामस्वरूप किसान पूर्णतया नास्तिक व प्रतिबद्ध लेखक हैं, जो सीधे, सरल व सहज होते हुए भी बेहद स्वाभिमानी हैं। वे साहित्य में लोभ-लाभ व लेन-देन की नीति के खिलाफ हैं। शाॅर्टकट व किसी भी प्रकार के अनुचित मार्ग से हवाई ख्याति प्राप्त करने वाले साहित्यकारों से उन्हें शख्त नफरत है। वे मेहनत में विश्वास करते हैं और अपनी एक-एक रचना पर महिनों तक काम करते हैं। यह मेहनती मिजाज उन्हें कृषि से ही मिला है। वे साहित्य में भी खेती की तरह ही पचते हैं। हर वक्त साहित्यमय रहने वाले किसान सृजन को पार्ट टाइम जाॅब मानने वाले तथाकथित लेखकों को फटकारते हैं। क्योंकि वे स्वयं सृजन को मुख्य कर्म मानते हैं। उनका पूरा लेखन मिशनरी भाव से है। वे लेखन के द्वारा सामाजिक बदलाव के हामी हैं। रामस्वरूप किसान माक्र्सवादी हैं, परन्तु उनके सृजन पर विचारधारा हावी नहीं है। स्वयं विचारधारा उनके सृजन के माध्यम से आलोकित होकर कलात्मक रूप ही धारण करती है। चिन्तन को कलात्मक रूप देने का हुनर कोई रामस्वरूप किसान से सीखे। उनकी प्रत्येक कहानी और कविता में कोई न कोई चिन्तन अवश्य बोलता है। राजस्थानी साहित्य में रामस्वरूप किसान प्रथम ऐसे राइटर हैं जिनकी चिन्तन प्रधान कहानियों की मूल संवेदनाओं व ध्वनित भावार्थों तक राजस्थानी के समीक्षकों की पहुंच नहीं बनी है। कहने का अर्थ है कि किसान की कहानियों का जटिल यथार्थ समझने के लिए बौद्धिक स्तर की जरूरत है। किसान को इस बात की पीड़ा भी है कि राजस्थानी में उनके लेखन को ठीक से समझने वालों की भी कमी है।
इनकी प्रथम पुस्तक है- ‘हिवड़ै उपजी पीड़’। यह सात सौ दोहों का संग्रह है, जिसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक इसके तीन संस्करण छप चुके हैं और खास बात यह है कि इस पुस्तक ने लोक में अपनी वह साख बनाई है जो बहुत कम पुस्तकें बना पाती हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस पुस्तक के दोहे जन-आंदोलनों में नाच-नाच कर गाए जाते हैं व हथियार की तरह बरते जाते हैं। क्योंकि इस पुस्तक के सभी सात सौ दोहे सात सौ कारतूस हैं जो पूंजीवादी व साम्राज्यवादी व्यवस्था पर दागे गए हैं। ये सभी दोहे किसान व मजदूर की त्रासदी पर लिखे गए हैं। और कवि की उपलब्धि यह है कि ये सभी दोहे लोक की जुबान पर चढ़ चुके हैं।

किसान की दूसरी किताब है- ‘गांव की गली-गली’। यह हिन्दी की एक लम्बी कविता है पुस्तकीय रूप में। इसके तीन संस्करण आ चुके हैं। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजस्थानी के प्रख्यात कवि डॉ. आईदानसिंह भाटी का कहना है कि इस पुस्तक को उनका भानजा सिरहाने रखकर सोता है। यह पुस्तक भी बड़ी संख्या में बिक कर लोक की जुबान चढ़ी है। इसमें गांव को अद्भुत ढंग से चित्रित किया गया है। इस कृति का नाट्य रूपांतरण मनोज कुमार ंस्वामी ने किया जिसे सूरतगढ़ की रंग संस्था ‘सूरतगढ़ नाट्य क्लब’ ने कई जगह मंचित किया। ‘कूक्यो घणो कबीर’ इनके जनवादी सोरठों का संग्रह है, जो खासा चर्चित रहा है। ‘आ बैठ बात करां’ राजस्थानी साहित्य में ख्यातिप्राप्त कविता संग्रह है। इसके भी दो संस्करण आ चुके हैं। यह पुस्तक उदयपुर के जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के राजस्थानी पाठ्यक्रम में सम्पूर्ण रूप में पढ़ाई जाती है। इसी पुस्तक पर शकुंतला देवल द्वारा एक लघु शोध प्रबंध लिखा गया है और खास बात यह है कि इस पुस्तक का डाॅ. शेरचंद द्वारा किया गया पंजाबी अनुवाद ‘आ बैह गल्लां करिए’ पंजाबी साहित्य में चर्चा का विषय रहा है। अनेक पंजाबी मैगजीनों में इस संग्रह की कविताएं छपी हैं।

राजस्थानी कहानी संग्रह ‘हाडाखोड़ी’ के भी दो संस्करण छप चुके हैं। इसे राजस्थानी साहित्य में उत्तर आधुनिक कहानियों का पहला कहानी संग्रह माना गया है। इस संग्रह में ग्रामीण जीवन को एक अलग ही एंगल से दिखाया गया है। इसमें बीस कहानियां हैं। जिनका बहुत-सी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। संग्रह की कुछ कहानियां नब्बे के दशक में लिखी गई भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियों में चुनी गई हैं। इस पुस्तक पर किसान को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ कथा साहित्य पुरस्कार तथा ज्ञान भारती कोटा का गोरीशंकर कमलेश राजस्थानी साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। इस संग्रह की ‘दलाल’ कहानी ने विश्व स्तर पर ख्याति पाई है। यह कहानी सन 1997 में अंग्रेजी में अनूदित होकर दिल्ली की ‘कथा’ मैगजीन में छपी थी। ‘दलाल’ कहानी का अंग्रेजी अनुवाद ‘द ब्रोकर’ क्राइस्ट यूनिवर्सिटी बैंगलोर (कर्नाटक) के बी.ए./ बी.एससी. समेस्टर 4 के इंग्लिश पेपर और महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी कोट्टायम (केरला) के आॅपन कोर्स आॅफ इंग्लिश पाठ्यक्रम में शामिल है।

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की राइटरस इन रैजीडेंसी फैलोशिप योजनान्तर्गत प्रकाशित कहानी संग्रह ‘तीखी धार’ राजस्थानी कहानी यात्रा में एक नया पड़ाव है। इस संग्रह की कहानियांे का कसाव व इनकी मारक शक्ति देखकर रसियन राइटर चेखव की याद आती है। कम शब्दों में बड़ी बात कहने का जो हुनर किसान में है वह इन कहानियों की ताकत है। इस संग्रह के सुधि पाठकों की यह टिप्पणी कि ‘कहानी तो इतनी ही होती है, बाकी तो बकवास है’ संग्रह के प्रभाव को व्यक्त करती है।
किसान की 16 कहानियों का ताजा संग्रह ‘बारीक बात’ गत वर्ष ‘बोधि’ से छपा है, जिसे मोहन आलोक आधुनिकता की अद्भुत भाव-भंगिमा की बेजोड़ यात्रा का क्लेसिकल पड़ाव मानते हैं। वे लिखते हैं- ‘किसान री कहाणियां आपरै कथा-सिल्प नैं साथै लेय’र आवै। अेक इसो कथा-सिल्प जिकै नैं सिल्प नईं, वां रो भासाई सभाव कैवणो चाइजै। यूं लागै ज्यूं लेखक आपरै लेखन मांय ‘डूंचियै’ ऊभो आपरो खेत रुखाळै है, अनै भासा रा बुलबुला उणरै च्यारूंमेर तिरै है।’ मक्सीम गोर्की का मानना है कि आम लेखक आम वक्त में लेखक न होकर खून-पसीना बहाने वाला आम नागरिक होता है। किसान इस कथन पर खरा उतरता है। हकीकत में किसान फकत खेती का ही किसान नहीं, वह कहानी का भी बेजोड़ किसान है और यह उनकी कहानियां पढ़कर जाना जा सकता है।
किसान के लघुकथा संग्रह ‘सपनै रो सपनो’ की कथाएं आकार व अर्थ में बहुत ही सूक्ष्म हैं। अपनी व्यंजनात्मकता के कारण ये लघुकथाएं बहुत ही प्रभावी रही हैं। इस संग्रह की कुछ लघुकथाएं बरसों तक माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के पाठ्यक्रम में शामिल रही हैं।

इसके अतिरिक्त हिन्दी कविता संग्रह ‘जीवन तो यहां है’ तथा ‘कविता की कविता’, राजस्थानी कविता संग्रह ‘बगत री कतरन’ छपने के इंतजार में है। किसान की पचपन राजस्थानी कहानियों का हिन्दी अनुवाद इन पंक्तियों के लेखक ने किया है जो शीघ्र ही प्रकाशित होकर पाठकों के हाथों में पहुंचेगा।
रामस्वरूप किसान श्रेष्ठ अनुवादक भी हैं। उनकी अनुवाद पुस्तक ‘राती कणेर’ जो कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के बांगला नाटक ‘रक्त करबी’ का राजस्थानी अनुवाद है, को साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार भी मिल चुका है। आपने साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के लिए सुरजीत पातर, अवतार सिंह पाश व अमृता प्रीतम की पंजाबीै व नामदेव ढसाल की मराठी कविताओं का राजस्थानी अनुवाद भी किया है।

किसान का एक अन्य रूप है संपादक का। किसान कथा प्रधान राजस्थानी तिमाही पत्रिका ‘कथेसर’ के संपादक हैं जो राजस्थानी का ‘हंस’ कहलाती है। इस पत्रिका ने अपने अल्पकाल में ही इतनी ख्याति प्राप्त की है कि आज यह राजस्थानी की शिखर पत्रिका है। जिसका श्रेय रामस्वरूप किसान के चिन्तनपरक संपादकीय लेखन को जाता है। यह पत्रिका अपने हर अंक में एक-दो नए कहानीकार पैदा करती है। किसान के निष्पक्ष रचना-चयन के कारण पाठकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पर पत्रिका का जो खास आकर्षण है वह है किसान का बेजोड़ संपादकीय। जिसके अन्य भाषाओं में अनुवाद तक होते हैं। किसान ने बुजुर्ग कवि राजेराम बैनीवाल की पुस्तक ‘राजेराम रा दूहा’ का संपादन भी किया है, वहीं हिन्दी व राजस्थानी की अनेक पुस्तकों की भूमिकाओं में आपके साहित्यिक हुनर को देखा-परखा जा सकता है।

(लेखक डॉ. सत्यनारायण सोनी राजस्थान के हनुमानगढ़ के रहने वाले हैं। वे बाढ़मेर जिले के एक स्कूल में बतौर प्रिंसीपल अपनी सेवाएं दे रहे हैं। देश की कई चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं, कहानियां, आलेख एवं शोध-पत्र प्रकाशित होते रहे हैं।)

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