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हम सभी के भीतर होते हैं सृजन के बीज: वाजदा खान

December 11, 2017 5:16 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

एस.एस.पंवार : वाजदा मैम आप एक चित्रकार है और चित्रकार होने के साथ-साथ आप एक कवयित्री भी हैं। यानि एक साथ दो कलाओं से आपका जुड़ाव रहा है, तो किसे आप अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं, कहां से आपको ये रंगो की प्रेरणा मिली और कब आपने इसकी शुरूआत की ?

वाजदा खान : सबसे पहले तो मुझे डांस और संगीत सुनने का बहुत शौंक था और खासकर के पेड़-पौधों, कपड़ों इत्यादि के रंग मुझे बहुत ज्यादा आकर्षित करते थे, खींचते थे अपनी ओर। बचपन में यूं तो ड्रॉइंग सबजेक्ट भी था मेरे पास, लेकिन तब तक इतना आंतरिक जुड़ाव अगर मैं मानूं तो चित्रकारी से नहीं था। उसके बाद जब मैं स्नात्कोतर कर रही थी तब अंदर से ही एक प्रेरणा हुई कि मेरे भीतर के जो रंग है, जो अलौकिक संसार है रंगों का, उन्हे बाहर आना चाहिए, तो उन्हीं दिनों मैंने चित्रकारी की शुरूआत कर दी थी। उसके साथ-साथ संगीत की जो रिद्म थी, नृत्य जो था मेरे भीतर, वो भी मेरी शुरूआती चित्रकारी में खुलकर बाहर आया है।

एस.एस.पंवार : तो नृत्य भी आप करते रहे हैं!

वाजदा खान: नृत्य करने जैसा तो हालांकि माहौल नहीं मिला लेकिन सीखने की एक दिली इच्छा जरूर रही है।

एस.एस.पंवार : जी। तो वर्तमान जो दौर है, चित्रकारी के क्षेत्र में गांवो-देहातों में जहां तक मैं देखता हूं तो बहुत कम लोग मिलते है। पूरे-पूरे गांव में कोई चित्रकार नहीं होते। पूरे शहर, जिले तक में रंगों का सूनापन यहां तक कि देखने को मिलता है। राज्य स्तर पर जाकर कोई एक-दो लोग मिलते हैं जो चित्रों की ठीक-ठाक समझ रखते हैं। तो आपको क्या लगता है इस क्षेत्र से दूर होने लगे हैं आज के युवा या कलाकार। इस बेरूखी का क्या कारण मानते हो आप? यूं लगता है  जैसे लोग इससे दूर भाग रहे हैं…

वाजदा खान : खैर … दूर तो इससे लोग नहीं भाग रहे। पहले से तो इसका चलन बढा है। लेकिन एक जो  सृजनात्मक प्रतिभा होती है। किसी भी क्षेत्र की हो चाहे वो लेखन की हो, चित्रकारी की हो, उसके बीज तो कहीं न कहीं हमारे भीतर होते ही हैं, लेकिन अधिकतर ऐसा होता है कि इन्हें उभारने के लिए हमे माहौल नहीं मिलता। घरों में, गांवों में इस तरह का माहौल है नहीं। साधारण तो क्या ठीक-ठाक शिक्षित परिवारों में भी इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा। शुरू से अगर इस संबंध में अच्छा मार्गदर्शन मिल जाए तो जरूर ये बीज पौधा बनकर फलित हो सकता है। संक्षेप में कहूं तो इससे जुड़ा माहौल मिलना जरूरी है और कलाकार को खुद भी कोशिश करनी चाहिए आगे बढने की। हालांकि हमारे घर में यहां तक की डांट भी पड़ती है कि अगर हम चित्रकारी करते हैं या कुछ लिख रहे हैं तो घर वाले कह भी देते हैं कि ये क्या कर रहे हो, इससे क्या होने वाला है….

एस.एस.पंवार: तो इससे हतोत्साहित हो जाते हैं नये बच्चे ( बीच में ही बात काटते हुए)

वाजदा खान : बिलकुल। बहुत ज्यादा हतोत्साहित होते हैं।

एस.एस.पंवार: तो आपको क्या लगता है कि चित्रकारी रोटी दे सकती है हमें…

वाजदा खान : बिलकुल। सकती क्या! देती भी है। पर ये क्षेत्र इस तरह का है कि इसमें बहुत ज्यादा परिश्रम, बहुत ज्यादा डेडीकेशन की जरूरत है, लेकिन वर्तमान दौर ऐसा है कि बहुत जल्दी सब कुछ चाहिए। आर्ट का क्षेत्र बहुत विशाल है, कैरियर, जॉब, बहुत व्यापक क्षेत्र है ये। लेकिन उसके लिए डिग्री चाहिए, उस फील्ड के लिए मास्टरी चाहिए, मेहनत भी चाहिए…

एस.एस.पंवार : तो ऩए स्टुडेंट इस क्षेत्र में अगर भविष्य बनाना चाहिए चाहें तो वो क्या कर सकते हैं और सरकारें इसके लिए क्या प्रोत्साहन दे रही है। उसके बारे में कुछ कहें

वाजदा खान: सरकारें तो… सरकारें.. सरकारों नें इसके लिए कुछ-कुछ एकेडमीज बनाई है कुछ-कुछ संस्थान बनाए हैं जैसे ललित कला अकेडमी है, इसके सेंटर भी हैं अलग-अलग। बहुते सारे प्रोग्राम करवाते हैं, इवेंट करवाते हैं ये संस्थान। फैलोशीप भी मिलती है कलाकारों को, स्टुडियो देते हैं काम करने के लिए। कुछ संस्थान है लेकिन मुझे नहीं लगता ये पर्याप्त हैं। बहुत ज्यादा नहीं है ये सब। विधार्थीयों के लिए भी मौजूदा सूचना-क्रांति और नए इलेक्ट्रोनिक माध्यमों के बाद कई रास्ते खुले हैं। विधार्थीयों को ये अच्छे से, संयम से तय करना चाहिए कि उन्हें क्या  करना है, कहां जाना है।

एस.एस.पंवार : मैम बड़े संयोग की बात है कि आज 11 दिसंबर है, एक दार्शनिक हुए हैं हिंदुस्तान में आचार्य रजनीश। ओशो जिन्हें कहते हैं, उनका भी आज जन्मदिन है, इसी दिन पैदा हुए थे वो, और आपकी भी जन्म तारीख है आज। तो उनके बारे अगर दो शब्द कहना चाहें तो… किस तरह के दार्शनिक थे वो…

वाजदा खान : देखिए… ( हंसते हुए) अब मैं ये तो कहना बहुत मुश्किल है कि वो किस तरह के दार्शनिक रहे हैं। लेकिन मैनें उनकी कई किताबें पढी है, कई तो  क्या बहुत ज्यादा उन्हें पढा है। तो मुझे बहुत सारी चीजें उनकी किताबों से मिली। बहुत सारी चीजें समझ भी नहीं आई। कई चीजें बहुत अजीब सी लगीं, विचित्र सी। लेकिन उनकी बहुत सारी बातों  ने, उनके विचारों ने मेरे जीवन को, मेरी सृजनात्मकता को काफी हद तक परिष्कृत किया, विस्तार दिया।  मैं अब भी उन्हें पढती हूं और पढना चाहती हूं उन्हें।

एस.एस.पंवार : जी। बहुत-बहुत शुक्रिया मैम आपका कि आपने हरियाणा खास के लिए वक्त निकाला।

वाजदा खान : जी, पंवार जी। आपका भी काफी सराहनीय काम मानती हूं कि हरियाणा खास कलाओं, साहित्या पर भी बारीक दृष्टि रखता है।

वाजदा खान एक संवेदनशील चित्रकार एवं कवयित्री है। वे नोयडा रहती हैं। उनके चित्रों की अनेकों एकल एवं सामुहिक प्रदर्शनियां हुई हैं। उनके दो कविता संग्रह ‘जिस तरह घुलती है काया’ और ‘समय के चेहरे पर’ अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें उनके एक संग्रह ‘जिस तरह घुलती है काया’ (ज्ञानपीठ प्रकाशन) के लिए हेमंत स्मृति पुरस्कार से भी नवाजा गया है।

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