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…तो भारत महान कड़े तै होग्या ?

September 19, 2016 8:56 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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गाम मैं सते, फते, नफे, सविता, सरिता, कविता अर धापां ताई, शनिचर नै सब बैठक मैं आये अर आराम तै बैठ कै दुःख-सुख की बतलाये अक न्यारे ढाल के आंकड़े कठ्ठे करकै ल्यावण की ज़िम्मेदारी किस किसनै नहीं निभाई। ताई धापां या बात देखकै बड़ी खुश होई अक सब कठ्ठे करकै ल्यारे थे। जो आंकड़े कठ्ठे करकै नहीं ल्यावैगा ओ एक किलो बरफी खवावैगा या शर्त थी। ताई बोली तो सते बतावैगा अपनी बात।
सते बोल्या – ‘सारी दुनिया के स्तर पै प्रति व्यक्ति सालाना कितनी आमदन सै बेरा सै?’’ सारे गुटर-गुटर देखैं इसकी कान्हीं। सते बोल्या – ‘बस! तो ले हम बतावैं सैं – 5120 डालर सै।’ भारत मैं प्रति व्यक्ति आय कितनी सै? इबकै तो कविता बतावैगी। कविता बोली – पक्का तो बेरा ना फेर या 500 डालर के करीब होनी चाहिये। सते नै बताया – ‘हां 560 डालर सै। दुनिया मैं भारत का स्थान 162वां सै बस 29 देश भारत तै तलै बताये।’
सूरता बी इतने मैं आग्या था, वो बोल्या – ‘तूं ये आंकड़े कड़े तै ल्याया भाई? ये तो कोरी बकवास सै। ‘साइनिंग इन्डिया’ इतना नीचै क्यूकर हो सकै सै? यो सते बदेशी कम्पनियां धोरै पीस्से लेरया सै ज्यां करकै भारत के बारे मैं इतनी घटिया अर झूठी बात करै सै। आजकाल बहोत पलूरे पाल लिये इन बदेशी कम्पनियां नै।’ सते बोल्या – ‘यो तो बख्त बतावैगा सुरते अक असली दल्ले कौन सैं इन बदेशी कम्पनियां के। 1857 की लड़ाई मैं भी इन दल्यां करकै मार खागे थे अर देश की आजादी की लड़ाई मैं जिननै फली नहीं फोड़ी वे आज देश के सबसे बड्डे देशभक्त बण कै बैठे सैं ये रामभक्त। बाकी ये आंकड़े वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर-2003 तै ल्याया सूं।’ सूरता बोल्या – ‘यो इंडीकेटर तै अंग्रेज छापते होंगे ना? बदेशी रंग कद तै चढ़ग्या तेरे पै तूं तो कसूता देशी था। म्हारी पक्की आस्था सै अक म्हारा देश तै कसूती ढालां दुनिया मैं ‘शाइन’ करण लागरया सै। अर हरियाणा तो म्हारे साहमी सै।’ सते ‘ये झूठे आंकड़े नहीं चालैंगे भाई।’ सते बोल्या – ‘कहवै तो रिपोर्ट ल्याकै दिखाद्यूं।’ सूरता बोल्या – ‘के फरक पड़ै सै। जिब म्हारी आस्था सै अक तक्षशिला अर नालन्दा की म्हारी इतनी बढ़िया परम्परा का कोए मुकाबला नहीं दुनिया मैं तो ईब इस रिपोर्ट पै क्यूंकर यकीन कर ल्यूं? या हमनै बदनाम करण की साजिश सै।’
ताई बीच मैं बोली – किसे रफड़े मैं फंसगे। आस्था का अर विज्ञान का जिब बी कोए टकराव हुया तो कुरबानी तो विज्ञान नै फालतू दी फेर जीत बी विज्ञान कीए होई। फेर म्हारे बरगे बोतडू आज बी अन्धविश्वास के अन्धेरे मैं पड़े सैं। जिब ब्रूनो नै दुनिया कै साहमी या बात कही अक धरती के चौगिरदें सूरज नहीं घूमता उल्टा धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो उस बख्त के कट्टरपंथियां नै अर इन सुरते बरगे आस्था आल्यां नै ब्रूनो जिन्दा जला दिया था। इसे तरियां गैलिलियो ताहीं भी फांसी की सजा सुना दी थी। आज तो ये सुरते बरगे बी आस्था की झोली मैं जा बैठे। इबै इन आंकड़यां पै आंगली कोए नहीं ठावैगा।
सरिता नै अपनी बात शिक्षा पै कही – ‘भारत मैं दुनिया की आबादी का 168 फीसद रहवै सै फेर दुनिया के वयस्क निरक्षरां मैं तैं 34 फीसदी भारत मैं सैं तो भारत महान कड़े तै होग्या? 94 विकासशील देशां के शिक्षा सूचकांक मैं भारत का स्थान 76वां सै। तृतीय ‘टरसरी’ स्तर की शिक्षा मैं प्रवेश का अनुपात दुनिया का 23 फीसदी सै अर भारत मैं यो 105 फीसदी सै। क्या कहने भारत के।’ सरिता कै सांस से चढ़गे अपनी बात कहन्ते-कहन्ते। सूरते पै फेर कोनी टिक्या गया अर बोल्या – ‘तूं किततै ल्याई स ये आंकड़े?’ सरिता बोली – ‘यूनेस्को की रिपोर्ट, एजुकेशन फॉर आल-2003-2004 मैं तै ल्याई सूं मेहनत करकै नै। अर सुनल्यो भ्रष्टाचार सूचकांक के हिसाब से दुनिया के 102 देशां मा तै भारत 71वें स्थान पै सै।
सिर्फ 31 देश सैं जो भ्रष्टाचार मैं भारत तै आगै सैं। यू आंकड़ा ट्र्रांसपेरैंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट 2003 तै लिया गया सै। ईबी कुछ कहना सै सूरत सिंह जी नै इन आंकड़या के बारे मैं? कोरी आस्था के दम पै कदे बी दुनिया कोनी चाली।’ सूरत सिंह कुछ कहना चाहवै था तो ताई बोली – ‘एकबै सारे बोल लेवैं फेर दूसरा गेड़ा आवैगा तो तूं बोलिये सुरते।’
कविता की बारी आई अर वा बोली – ‘विदेशी ऋण का बोझ भारत पै 1998-1999 मैं 9823 करोड़ डालर था जो 2003 जून ताहीं बधकै 10,960 करोड़ डालर पै पहोंचग्या। 1998 में मार्च ताहीं देश के धनवानां पै बकाया कर 47,444 करोड़ रुपइये था जो 2002 के 21 मार्च ताहीं बधकै 86,342 करोड़ रुपइये होग्या। ये सारे आंकड़े मनै आर्थिक सर्वे 2002-2003 तैं कठ्ठे करे सैं। दूजे कान्हीं किसानां की 4500 हजार करोड़ के लगभग की सबसिडी पै जूत बजा राख्या सै। कम तै कम जिब म्हारे नेता गाम मैं आवैं तो इन बातां पै इनका के कहना सै हमनै बूझना तो चाहिए।’
फते कई वार का मसकोड़े से मारै था, उसका नम्बर आया तो उसनै बताना शुरू करया – ‘म्हारे बरगे 62 देशां के सूचकांक के आधार पै वैश्वीकरण की कटारी चाल्ले पाछे के विकास का किस्सा घणा दर्दनाक सै। फेर बेरा ना म्हारे देश के नीति निर्धारकां नै यो सब दिखाई क्यों ना देन्ता। इन देशां मैं दुनिया की 80 फीसदी आबादी रहवै सै। 2001 में भारत का स्थान 49वां था फेर भला हो एनडीए की सरकार का अक 2002 मैं यो 57वां होग्या, अर 2003 मैं यो 61वां होग्या। सुरते कै आज बेरा ना के होरया था बोल्या – ‘सारी काट करोगे अक किमै आच्छी बात बी बताओगे?’
सरिता बोली – ‘ईब आच्छी कड़े तैं घड़ां सुरते की खातर? हाल आले राज के आये पाछै बी हालात कोन्या ठीक हुए। आंकड़यां समेत इसपै फेर कदे सही।’

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लेखक परिचय

लेखक डॉ. रणबीर सिंह दहिया, पीजीआई रोहतक से रि. सर्जन एवं समाजसेवी हैं। वर्तमान में डॉ. साहब जन स्वास्थ्य अभियान के तहत शिविर एवं ओपीडी के जरिये लोगों को अपनी निशुल्क सेवाएं दे रहे हैं। डॉ. दहिया हरियाणवी साहित्य के मर्मज्ञ हैं और हरियाणवी भाषा में ही दैनिक ट्रिब्यून में लंबे समय से  स्तंभकार भी हैं।

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