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श्राद्ध पक्ष – कौन हैं पितर? कैसे होती है पितरों की शांति?

September 17, 2016 4:36 pm by: Category: खबर खास, तीज तयोहार Leave a comment A+ / A-

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पितर….. वैसे तो ये शब्द बहुत ही श्रद्धा का प्रतीक है और भाद्रपद पूर्णिमा से लेके आश्विन मास का पूरा कृष्ण पक्ष यानि आश्विन अमावस्या तक तो पूरा पक्ष ही पितृपक्ष के नाम से जाना जाता है। चलो ये तो पूरे भारत वर्ष की बात हुई लेकिन हरियाणा में प्रवेश करते ही पितर शब्द के मायने कुछ और भी लगने लग जाते हैं। दरअसल यहां पितर का इस्तेमाल नकारात्मक अर्थों में भी लिया जाता है खासकर जब किसी व्यक्ति के कारनामों से हमें लगातार हानि उठानी पड़ रही हो और हम उसे चाहकर भी अपने से दूर न रख पा रहे हों तो ऐसे व्यक्ति को पितर या त्हीत जैसी खास संज्ञाओं से नवाजा जाता है। कहा जाता है ‘यो भी म्हारै पितर लाग रह्या है।’

पितरों के पूजा स्थल मढ़ी और थान

दरअसल जो परिजन संसार से विदा ले चुके होते हैं उन मृत आत्माओं के लिये पितर शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन हरियाणा में इसमें भी एक अलग कैटेगरी है। एक और जहां देश के बाकि हिस्सों में सभी मृत जनों को पितर माना जाता है वहीं हरियाणा में परिवार का जो अविवाहित पुरुष सदस्य अकाल मृत्यु का शिकार होता है असल में तो वही पितर माना जाता है। हरियाणा के खेतों में आज भी अपने इन पितरों के प्रति आस्था प्रकट करने के लिये बनाई गई मंढ़िया या छोटे-छोटे मंदिर दिखाई दे जाते हैं। हरियाणवी में इन्हें मंढ़ी और थान कहकर भी पुकारा जाता है। परिवार के समस्त पूर्वज़ों के नाम से भी इस तरह के थान बनाये जाते रहे हैं।

कैसे होती है पूजा

घर में कुछ नया काम किया जा रहा हो तो थान पर जाकर पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है और प्रत्येक अमावस के दिन दुध को बेचा नहीं जाता बल्कि उससे खीर इत्यादि बनाई जाती है। जिसका कुछ अंश थान पर भी चढ़ाया जाता है। मंढ़ी या थान पर दिया जलाने की परंपरा रही है। आर्य समाज के प्रभाव में हरियाणा में ग्रामीण स्तर पर मूर्ति पूजा एक समय में बहुत कम हो गई थी लेकिन अपने पूर्वजों के प्रति लोग सम्मान दिखाते रहे हैं। इन पितरों की महता इतनी मानी जाती है कि अगर किसी के यहां भैंस भी ब्याती (प्रजनन करती) है तो उसका शुरुआती दुध थान पर जरुर चढ़ाया जाता है। इन सब के पीछे लोगों की एक गहरी आस्था रही है और आज भी है।

श्राद्ध, श्रद्धा और दुकानदारी  

वैसे तो आजकल आप देख ही रहे होंगें कि सब कुछ बाजार की चकाचौंध में मौलिकता को खोकर एक नये फ्लेवर के साथ सामने आ रहा है। कई बार हमें लगता है कि यह विकास है, आधुनिकता है लेकिन असल में जब उसके पीछे की कहानी देखते हैं तो मुनाफा कमाने की होड़ में सांस्कृतिक प्रतिकों की, पहचानों की बलि के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता। क्या कारण है कि श्राद्ध जिसे असल में पितरों के प्रति श्रद्धा जताने का एक अवसर या कहें अपने पूर्वजों को स्मरण करने का एक महोत्सव माना जाता है उसमें आज लोगों को तरह-तरह के भय से अवगत करवाया जा रहा है। उन्हें डरा धमकाकर अपने उत्पाद बेचे जा रहे हैं। पितृशांति के लिये उल-जुलूल उपाय बताये जा रहे हैं।

कबीर और पितरों की खीर

श्राद्ध के दिन चल रहे थे कि एक दिन पंडित जी ने कबीर से कहा कि पितरों के लिये खीर बनानी है जाओ उसके लिये दूध लेकर आओ। अब कबीर तो ठहरे कबीर उन्होंनें भी सोचा कि ऐसे मना करने पर तो पंडित जी को बुरा लग जायेगा। इनके साथ बहस भी इस समय बेफिजूल है। इसलिये कबीर जी ने बर्तन उठाया और चल पड़े दूध की तलाश में। रास्ते में क्या देखते हैं कि एक गाय मरी हुई पड़ी है अब कबीर जी को युक्ति सूझी। उन्होंने थोड़ी घास इकट्ठी की उसे गाय के आगे डाल दिया और गाय के पास ही बर्तन लेकर बैठ गये। उधर पंडित जी का समय निकला जा रहा था वे व्याकुल हुए और फिर जिधर कबीर गये उधर ही कदम बढ़ा दिया। थोड़ी दूर ही जाकर जब कबीर को मरी गाय के पास बैठे देखा तो झल्ला गये। अबे यहां क्या कर रहा है इतनी देर हो गई पितरों की खीर कब बनाऊंगा, उन्हें कब खिलाऊंगा। कबीर जी शांत मन से बोले महाराज उसी का तो प्रबंध कर रहा हूं देखते नहीं हो गाय के सामने चारा भी डाल रखा है जैसे ही गाय दूध देती है हम चलते हैं। अब पंडित जी का क्रौध सातवें आसमान को भी पार कर गया, और कबीर पर पिलते हुए कहा.. कही मरी गाय को चारा खाते दूध देते देखा है सुना है क्या। अब पंडित जी वहीं पहुंच गये जहां कबीर उन्हें ले जाना चाहते थे। कबीर ने कहा जब यह हाल फिलहाल मरी गाय चारा खाने और दूध देने में सक्षम नहीं है तो सालों पहले मृत्यु को प्राप्त हुए पितर कैसे खीर ग्रहण करेंगें?

खैर कबीर वाले पंडित जी की बात और थी उन्हें कुछ न सूझा हो लेकिन वर्तमान पंडित जी शास्त्रों के हवाले से कहते हैं कि आपके पूर्वज कव्वे, गाय, चींटी, कुत्ते या फिर गरीब, ब्राह्मण आदि किसी न किसी रूप में उसे ग्रहण करने जरुर आते हैं।

अगर आपके पितर रूठे हैं तो वे शांत हो जायें इसी कामना के साथ श्राद्ध पक्ष, पितृपक्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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