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शायर-ए-मशरीक़ सर मुहम्मद इक़बाल

November 9, 2017 9:25 am by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

 

यूनान-मिस्र-रोमा सब मिट गए जहाँ से

अब तक मगर है बाक़ी नामो-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा

देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता से कूट-कूटकर भरी ये पंक्तिया है उर्दू शायर सर मुहम्मद इक़बाल की। इक़बाल एक शायर ही नहीं, अविभाजित हिंदुस्तान के मशहूर कवि, नेता और दार्शनिक भी थे। उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की बेहतरीन शायरियों में गिना जाता है।

इन्हें अल्लामा इक़बाल भी कहा जाता है। इक़बाल का जन्म 9 नवम्बर 1877 को सियालकोट पंजाब में हुआ। इनके दादा सहज सप्रू हिंदू कश्मीरी पंडित थे जो बाद में सिआलकोट आ गए। बताया जाता है कि मुस्लिम लीग से भी इक़बाल लम्बे समय तक जुड़े रहे।

इकब़ाल ने इस्लाम के धार्मिक और राजनैतिक दर्शन के साथ-साथ गरीबी, अत्याचार, गुलामी जैसे हर विषयों पर बड़े पारदर्शी अदांज में लिखा है। एक जगह कवि इक़बाल लिखते हैं-

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी

उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गुन्दम को जला दो 

इनकी प्रमुख रचनाओं में असरार-ए-ख़ुदी, रुमुज़-ए-बेख़ुदी और बंग-ए-दारा शामिल है,  जिसमें देशभक्तिपूर्ण तराना-ए-हिन्द (सारे जहाँ से अच्छा) भी है। फ़ारसी में लिखी इनकी शायरी ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में भी काफी प्रसिद्ध है, जहाँ इन्हें इक़बाल-ए-लाहौर कहा जाता है।

अलामा इक़बाल (विद्वान इक़बाल) शायर-ए-मशरीक़ (पूरब का शायर) और हकीम-उल-उम्मत (उम्मा का विद्वान) कहे जाने वाले इस शायर ने  21 अप्रैल 1938 को हमसे विदा ले ली। भारत, पाकिस्तान और अफ़गान समेत कई देशों में आज भी उन्हें याद किया जाता है।

( लेखक हरियाणा खास के कंटेंट एडिटर हैं )

शायर-ए-मशरीक़ सर मुहम्मद इक़बाल Reviewed by on .   यूनान-मिस्र-रोमा सब मिट गए जहाँ से अब तक मगर है बाक़ी नामो-निशाँ हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा देशभक्   यूनान-मिस्र-रोमा सब मिट गए जहाँ से अब तक मगर है बाक़ी नामो-निशाँ हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा देशभक् Rating: 0

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