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लोग कैसे बनते हैं बाबाओं के अंधभक्त?

September 27, 2017 10:39 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

भारत भले ही संविधान के अनुसार एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक सोच के अनुसार चलने वाला देश हो लेकिन हकीकत यही है कि यहां आज भी अधिकतर लोग जो किसी न किसी धर्म से जुड़े हैं वे डार्विन के विकासवादी सिद्धांत की बजाय ब्रह्मा, आदम और हव्वा, एडम एंड इव आदि द्वारा सृष्टि के विकास को मानते हैं। भारत को आध्यात्मिक रूप से दुनिया का विश्वगुरु होने की उपाधि भी कुछ धर्मानुयायी बताते हैं। ऐसे में कोई दो राय नहीं होनी चाहियें कि कोई बाबा अपना विशाल साम्राज्य खड़ा करता है। गुरमीत राम रहीम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दो बहादुर लड़कियों ने बाबा के साम्राज्य की नींव हिला दी। बाबा आज भले ही सलाखों के पिछे हों। भले ही वह जेल में सजा काट रहा हो लेकिन उसके करिश्माई व्यक्तित्व का जादू अब भी बरकरार है। इसी तरह आसाराम के भक्त आज भी उन्हें निर्दोष बताने वाले पोस्टर लिये उनकी रिहाई की मांग करते हुए मिल जायेंगें। हरियाणा के ही एक अन्य तथाकथित संत रामपाल के अनुयायि भी उन्हें अपना मसीहा मानते हैं और उनके हर कृत्य पर मिट्टी डालने को तैयार हैं। आइये यह समझने का प्रयास करते हैं कि ये तथाकथित संत आखिर ऐसी कौनसी घुट्टी पिलाते हैं अपने भक्तों को कि कुछ भी कर जाने पर, कुछ भी हो जाने पर भक्तों की आंखें नहीं खुलती।

बाबाओं के पिछे भीड़ कैसे बढ़ती है?

हमें बाबाओं में, भगवान के तथाकथित संदेशवाहकों में या कहें इन गॉडमैन में भले ही लाख बुराई दिखती हों। भले ही कानून इन्हें किसी तरह की सजा सुना दे लेकिन इनके भक्त और अनुयायियों को देखकर हर कोई यही कहता है कि आखिर कुछ तो बात होती है इन बाबाओं में कि लोग इनकी तरफ खिंचे चले जाते हैं। कुछ दिन इनके पास जाने के पश्चात तो वह इतने कट्टर अनुयायि तक हो जाते हैं कि अपने गुरु के खिलफ एक शब्द तक नहीं सुन सकते। अपने आस-पास के माहौल को देखते हुए मेरे व्यक्तिगत आकलन के अनुसार जो मुझे लगती हैं वह इस प्रकार हैं।

भावनात्मक समर्थन  पहली बात तो भक्तों को बाबा के पास जाते ही भावनात्मक रूप से सहारा मिलता (इमोशनल सपोर्ट) है। क्योंकि इनके पास जाने वाले अधिकतर भक्त किसी न किसी दुख के सताये होते हैं। जब उन्हें बाहर कोई सहारा नहीं मिलता या अभी तक जिन देवी-देवताओं, कुलदेवताओं पर वे विश्वास करते रहे हैं उनसे भी उम्मीद टूट जाना इन्हें इन डेरों की तरफ खींच ले जाता है। जहां ये इन्हें धीरज बंधाते हैं, इनकी टूट चुकी उम्मीदों को फिर से जगाते हैं। इसी इमोशनल सपोर्ट की वजह से इनमें आत्मबल पैदा होता है, कष्टों से लड़ने की तो नहीं लेकिन उन्हें सहन करने की शक्ति बढ़ जाती है। इस भावनात्मक समर्थन के कारण ही ये दुख में भी सुख का आनंद लेने लग जाते हैं। इसी भावनात्मक जुड़ाव की वजह से भक्तों पर लगातार परत दर परत एक आंखों पर पट्टी चढ़ने लगती है फिर बाबा जो भी पट्टी पढ़ाए वही सही लगने लगती है।

नशा, भूत-प्रेत व कष्टों से छुटकारा सिरसा का डेरा सच्चा सौदा हो, करौंथा वाले रामपाल का आश्रम, आशाराम की कथाएं हो या अन्य सत्संग भजन, किर्तन जागरण। हर जगह लोग आध्यात्मिक ज्ञान पिपासा को शांत करने के लिये नहीं बल्कि अपने भौतिक संतापों यानि जीवन मे सुख, समृद्धि में आयी कमी, शारीरिक कष्ट, व्याधियों आदि के सताये हुए अधिक जाते हैं। जिसका परिवार नशे से बुरी तरह प्रभावित हो और सत्संग में जाने, गुरु का नाम लेने से यदि वह दुर्व्यसनों को छोड़ देता है तो परिवार में सुख शांति आने लगती है। धीरे-धीरे परिवार की गाड़ी पटरी पर लौट आती है ऐसे में भला वह परिवार क्यों न उस साधु का शुक्रगुजार होगा। जिस रोग को चिकित्सक मनोविकार बता रहे थे और रोगी को पागल या फिर यह कहते कि यह ढोंग कर रहा/रही है। गुरु का नाम लेने से यदि वह परिवार में उधम मचाना बंद कर देता है। उसकी सेहत में सुधार होने लगता है तो उक्त व्यक्ति से संबंधित परिवार इसे चमत्कार नहीं तो क्या मानेगा। जिस साधु, संत, महात्मा को व्यक्ति मानने लगते हैं उनके प्रेरणादायी वचनों को सुन-सुन कर उनमें कष्टों का निवारण करने की नहीं तो सहन करने की क्षमता जरूर विकसित होते है। यही कारण है कि वह डेरे के अनुयायी बन जाते हैं और वहीं अपनी तमाम तकलीफों का निवारण पाते हैं।

विशिष्ट पहचान हमारे यहां बहुत सारे धर्म हैं, जातियां, जातियों में भी जातियां हैं। लेकिन बावजूद इसके लोगों में अभी भी स्वयं को अलग से दिखने की, अपनी विशिष्ट पहचान कायम करने की इच्छा पनपती है। डेरे के अनुयायी बनकर वह इस पहचान को कायम कर लेते हैं। यहां उन्हें प्रत्येक धर्म जाति के लोग एक नज़र आते हैं। उदाहरण के लिये हर धर्म जाति विशेष के लोग सिरसा डेरे के अनुयायि होते ही एक अलग उपनाम पा लेते हैं इंसा। यह विशिष्ट पहचान उन्हें एक दूसरे से जोड़े रहती है। अब तो डेरे के अनुयायियों में रिश्ते भी होने लगे हैं। हरियाणा जैसे प्रदेश में अपने अविवाहित बच्चों के विवाह के लिये भी कोई डेरे का समर्थक बन जाये तो नकारा नहीं जा सकता।

भेदभाव विशिष्ट पहचान के अलावा एक और कारण है सामाजिक भेदभाव, हमारे समाज का ढांचा ही कुछ इस तरह का है कि यहां हर जाति स्वयं को दूसरी से श्रेष्ठ साबित करने की जुगत में रहती है। इसलिये निम्न मानी जाने वाली जातियों, तबकों के लोग इन डेरों में स्वयं को एक बराबर मानते हैं। मानवीय और सामाजिक तौर पर यह उनके लिये कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। सामाजिकरण की इस प्रक्रिया में यहां वे ज्यादा सरंक्षित महसूस करते हैं अपने आप का सामाजिक उत्थान मानते हैं। यही कारण भी है के डेरों के अनुयायियों में अधिकतर लोग निम्न माने जाने वाले तबकों से आते हैं।

प्रवचन – डेरों में संत, साधुओं, बाबाओं द्वारा दिये जाने वाले प्रवचन भी एक बड़ा कारण हैं क्योंकि इन्हीं प्रवचनों, उपदेशों के कारण भक्त आकर्षित होते हैं। प्रवचन या कहें उपदेशों में जो संदेश दिये जाते हैं वह भक्तों को सुनने में बहुत अच्छे लगते है। इन्हीं अच्छे प्रवचनों से दिन ब दिन उनके दिमागों में बाबा की छवि भी अच्छी बन जाती है। बल्कि या कहें उस बाबा की छवि उनके जहन पर चिपक जाती है। इसके पश्चात वे सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते एक अजीब धुन में रहने लगते हैं। यही कारण है कि बाहरी दुनिया, देश, समाज से उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता। बाबा जी उनकी दुनिया को बदल चुके होते हैं। जहां वे दुनियावी दु:खों से दूर होते हैं।

सपष्टीकरण –  बाबाओं के पिछे भीड़ होने के जो कारण यहां बताये गये हैं वह किसी भी प्रकार से शोध या तथ्यों पर आधारित नहीं हैं बल्कि अपने अनुभव जनित ज्ञान के आधार पर किया गया आकलन है।

  • जगदीप सिंह
लोग कैसे बनते हैं बाबाओं के अंधभक्त? Reviewed by on . भारत भले ही संविधान के अनुसार एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक सोच के अनुसार चलने वाला देश हो लेकिन हकीकत यही है कि यहां आज भी अधिकतर लोग जो किसी न किसी ध भारत भले ही संविधान के अनुसार एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक सोच के अनुसार चलने वाला देश हो लेकिन हकीकत यही है कि यहां आज भी अधिकतर लोग जो किसी न किसी ध Rating: 0

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