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सोशल मीडिया – किशोरों की आवश्यकता भी सिरदर्दी भी

August 23, 2017 9:16 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

विज्ञान और तकनीक ने जहां जीवन को सरल सुखमय और आसान बनाया है वहीं जीवन के लिये ख़तरे भी पैदा किये हैं। कह सकते हैं यह एक प्रकार का चाकू है जिसे हम रसोई में भी इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर किसी अपराध को अंजाम देने में भी। यह पूरी तरह उस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी कुछ वैसा ही है जिसके फायदे भी हैं और ख़तरे भी। विशेषकर बचपन और जवानी की दहलीज पर खड़े किशोर (टीनेएजर्स) जिनके भीतर पहले से ही एक तूफान सा चलता रहता है के लिये तो यह और भी तेज़ औज़ार/हथियार बन जाता है। किशोरावस्था एक ऐसा समय है जो उत्तेजना व निराशा, आत्मविश्वास और असुरक्षा, सौहार्द एवं अकेलेपन से भरा होता है। ऐसे में पिछले लगभग एक दशक से सोशल मीडिया इस उभरती पीढ़ी के लिये अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का, लोगों से जुड़ने का, नई-नई चीज़ों के बारे में सीखने समझने और ज्ञान अर्जित करने का सशक्त माध्यम बना है। लेकिन साथ ही इसका उपयोग इस पीढ़ी को इतना रास आने लगा है कि इस आभासी दुनिया को ही वे वास्तविक मानने लगे हैं। इस आभासी दुनिया में परोसी गई भ्रामक जानकारियों से अपनी धारणाएं बनाने लगे हैं और वास्तविक समाज एवं व्यावहारिकता से विमुख होने लगे हैं। आइये जानते हैं इस किशोर पीढ़ी के लिये सोशल नेटवर्किंग के नफे नुक्सान के बारे में।

सोशल मीडिया क्या है?

ऐसी कोई भी वेबसाइट या मोबाइल एप्लिकेशन जिसके माध्यम से लोगों से जुड़ा जा सके, उनके साथ बातचीत करने का मंच उपलब्ध करती है सोशल मीडिया कही जाती है। उदाहरण के तौर पर फेसबुक, ट्विटर वट्स एप आदि।

सोशल मीडिया की टीनएजर्स तक पंहुच

TRAI (ट्राई) के अनुसार 31 मार्च 2016 तक भारत में इन्टरनेट सब्सक्राइबर की संख्या 34 करोड़ 20 लाख 65 हजार है। इनमें से 97 प्रतीशत यूजर्स सोशल मीडिया नेटवर्किंग की किसी न किसी वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया भर में लगभग 250 करोड़ लोगों की विभिन्न सोशल मीडिया प्रोफाइल बनी हुई हैं। टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरटी ऑफ इंडिया के अनुसार भारत में लगभग 16 करोड़ 40 लाख 81 हजार टीनएजर्स सोशल मीडिया वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं। लगभग पांच साल पहले 2012 में कॉमन सेंस मीडिया द्वारा किये गये एक शोध से सामने आया था कि अकेले अमेरिका में 13 से 17 साल की उम्र के 90 फीसदी युवक सोशल मीडिया की किसी न किसी फोर्म का इस्तेमाल करते हैं। 1030 युवाओं पर हुए इस शोध में 68 प्रतिशत ने अपनी पसंदीदा सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक को माना है। आज भी दुनिया भर में फेसबुक के युजर सबसे अधिक हैं और हाल ही में आई एक रिपोर्ट में तो भारत में सबसे ज्यादा फेसबुक यूजर होने का दावा किया गया है।

क्या हालत कर दी है सोशल मीडिया ने टीनएजर्स की

टीनएजर्स यानि किशोरों पर सोशल मीडिया का व्यापक प्रभाव पड़ा है। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते और कुछ याद रहे न रहे लेकिन अपना स्टेटस अपडेट करना, सेल्फि पोस्ट करना, किसने फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी है और किसने फ्रैंड बनाने से नकार दिया है। फ्रैंड सर्किल में किसके दोस्त ज्यादा बन रहे हैं किसको लोग ज्यादा फॉलो कर रहे हैं, किसको ज्यादा लाइक मिल रहे हैं आदि बहुत सारी चीज़ें अवश्य याद रहती हैं। इसलिये तो रात के दो बजे भी आंख खुलती है तकिये नीचे रखे फोन को चैक जरूर किया जाता है। हालांकि अधिकतर तो रात के दो बजे तक सो ही नहीं पाते 10 से 12 बजे तक तो इधर उधर के यार दोस्त घेरे रहते हैं फिर रातों की नींद चुराने वाले भी इंतजार में रहते हैं। अगर चैटिंग शुरु हो गई तो फिर दो क्या और चार क्या बजने दो जितने बजते हैं। हालांकि दुनिया भर की जानकारी भी इसी सोशल मीडिया से जुटाई जाती है। स्कूल में अधूरी रही अध्ययन की कमियों को यू ट्यूब सहित अन्य स्टडी और करियर बेस्ड साइट्स और ऐप से पूरा किया जाता है। इन्हीं रूझानों को देखते हुए सीखाने वाले यू ट्यूब चैनल्स एवं मोबाइल ऐपलिकेशन थोक में मिल रहे हैं।

मनोवैज्ञानिकों की राय में किशोरों पर सोशल मीडिया के जो नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं उनमें से प्रमुख हैं –

मुझे नींद न आये, मुझे चैन न आये कोई जाये जरा ढ़ूंड के लाये

यह सिर्फ गाने की पंक्तियां नहीं है बल्कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल से पैदा होते हालातों को बयां करने वाला एक प्रासंगिक कथन है। फेसबुक व्हट्सप का मोह वर्तमान में सब तरह की मोह माया को पिछे छोड़ रहा है। अध्ययन करने वाले विश्वामित्र रुपी किशोरों के लिये सोशल मीडिया की लत उनका तप भंग करने के लिये भेजी गई मेनका के समान हैं। सारी तपस्या को छोड़कर फेसबुक, व्हटस्प, यू ट्यूब रूपी मेनका से लिपटे रहते हैं। कोई और आकर ही टोकता है बस कर सुबह हो गई मामू। चिकित्सकों का मानना है कि किशोरों को कम से कम 9 घंटे की नींद लेनी चाहिये लेकिन होता यह है कि मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन में जो चमक होती है उससे आपको नींद आने में परेशानी होती है साथ ही यदि ज्यादा करीब से आप उसे देखते हैं तो इससे आंखों पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। नींद की समस्या से अनेक अन्य समस्याएं भी पैदा होती हैं, मसलन नींद से कब्ज भी हो जाती है और ग्रंथों में लिखा है कि नींद और कब्ज़ ही लगभग सभी बिमारियों की जड़ हैं। इसलिये सोशल मीडिया का लालच छोड़िये कम से कम इतना तो छोड़ ही सकते हैं कि चैन की नींद ले सकें।

आज कल याद कुछ और रहता नहीं

सच मानिये नगिना फिल्म के इस गाने की यह लाइन मोहमम्द अज़ीज साहब ने सोशल मीडिया के प्रति आपके प्यार को देखते हुए ही गाई थी। कुछ और ऐसे में कैसे याद रह सकता है। एक तो उम्र का यह पड़ाव ही ऐसा होता है कि मन-मस्तिष्क के साथ शरीर में ढ़ेरों तूफान उठते रहते हैं। ऊपर से सोशल मीडिया के प्रति आपका जुड़ाव कुल मिलाकर आपकी एकाग्रता में इससे कमी आती है और आप बार बार दांतों में ऊंगली दबाते हुए, सिर खुजलाते हुए आदि भिन्न-भिन्न मुद्राएं बनाकर सोचते रहते हैं कि मैं सोच क्या रहा था? मुझे करना क्या था? मैं क्या भूला हूं? कुछ भूल तो नहीं गया?

दिल ये बेचैन वे सेल्फि पे नैन वे

किशोरावस्था में बेचैनी तो वैसे ही बहुत रहती हैं, प्रतियोगिता की भावना होती है, आकर्षित होने और आकर्षित करने की ललक होती है ऐसे में ईर्ष्या की भावना भी घर कर लेती है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले एक-एक लाइक, एक-एक कमेंट से बेचैनी और खुशी लगातार बढ़ती रहती है। लेकिन असल बात यही है कि सोशल मीडिया की इस आभासी दुनिया में हर एक पोस्ट को लेकर बेचैनी होती है स्टेट्स डालें या सेल्फि जब तक अपेक्षानुसार लाइक या कमेंट नहीं मिलते चैन कहां मिलता है।

उपरोक्त दशा तो किशोरों की रहती है साथ ही व्यवहार में एक चिड़चिड़ापन आ जाता है जो कि इस उम्र में स्वाभाविक भी होता है लेकिन यह और भी ज्यादा हो जाता है और किशोरों के भ्रमित होने, भटकने की प्रबल संभावनाएं होती हैं। सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल करने वालों के तो अवसादग्रस्त होने की संभावनाएं भी अधिक रहती हैं। इनके अलावा कुछ किशोर ख़तरनाक सोशल साइट के जाल में भी फंस जाते हैं और जान माल का नुक्सान कर बैठते हैं ब्लू व्हेल इसका ताजा उदाहरण है। इसके अलावा व्यस्क साइट्स पर आपत्तिजनक सामग्री देखकर भी किशोर युवक-युवती भटक जाते हैं।

कुल मिलाकर कह सकते हैं लोगों से जुड़ने, जानकारियां जुटाने, कुछ नया करने, नया सीखने के लिहाज से उपयोगी यह तो बहुत है लेकिन इसका कोई सार्थक इस्तेमाल न करके मात्र अपनी पोस्ट डालने, लाइक कमेंट करने या फिर इधर उधर से सच्ची झूठी जानकारियों को फारवर्ड करने का एक माध्यम ही बनाते रहें और रात-रात भर चैटिंग में जुटे रहें या फिर आपत्तिजनक सामग्री पढ़ते देखते रहें तो इसके ख़तरे भी बहुत हो जाते हैं।

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