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सोशल साईट पर अनपढ़ों की जमात

January 5, 2018 10:10 pm by: Category: खबर खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

सूचना-तकनीक का विकास वरदान भी है, और अभिशाप भी। पिछले कुछ सालों में मैं देख रहा हूं मेल-मिलाप, बातें, चिंतन, लेखन और पठन की ओर रूझान लगभग खत्म सा होता जा रहा है। तो वहीं फेसबुक, व्हाटअप, मैसेंजर इत्यादि द्वारा संदेशों के फैलने का प्रचलन गति पकड़ रहा है। विज्ञान के इस आविष्कार और बढती सूचना-तकनीक के बाद आज का मीडिया और पत्रकारिता इस रास्ते पर आ गई है कि कुछ राजनीतिक खेमों ने इसे अपना हथियार बना लिया है।

अपवाद को छोड़ दिया जाए तो बात चाहे किसी भी विषय की हो। उसकी बिना वैज्ञानिक-दृष्टिकोण से जांच पड़ताल किए, और सिर्फ एक-तरफा रखते हुए, बिना निष्पक्षता बनाए सोशल-नेटवर्क पर उसे रखना व उसका खेमेगत अंध-अनुयायियों द्वारा प्रचार-प्रसार होना, लाईक और उत्साहवर्धन होना इस बात का संकेत है कि इस तरह की सोशल साईटों पर अनपढों की जमात अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है। इतना ही नहीं ऐसे भी अकाउंट धारक हैं, जो इनके फॉलोवर हैं। और आंख बंद करके इस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।

जैसा कि आपको विदित है कि फेसबुक को जिस तरह से ‘गिव एंड टैक’ का मंच बनाया जा रहा है तो ऐसे में यथार्थता और समाजवादी बातें करने वाले, साहित्यिक या कला विषयों से जुड़े लोग भी ‘घुन’ बनकर ‘चने’ के साथ पिसे जा रहे हैं। बात कुछ यूं है कि टिप्पणियां और पसंदगी बढाने के लिए उन्हें जबरन उन पोस्टों पर भी उतरना पड़ रहा है जिनसे उनका कोई सरोकार न हो, और इस तरह के ‘मजबूरन सैंकड़ों लाईक’ लोकतंत्र की उन फासीवादी सरकारों की तरह है जो एक-एक करके उन गरीब लोगों के मतों से खड़ी हो जाती है जिन्होनें साहूकारों से कर्ज ले रखा है और साहूकारों के कहने पर अपने वोट का इस्तेमाल करते आए हैं।

कुछ फर्जी खबरें भी सोशल नेटवर्क पर खरपतवारों की पनप रही है। पिछले महीनों कर्नाटक में एक निर्भिक पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। मुझे दुख है ऐसी मौतों का जो कुछ कट्टरपंथियों द्वारा इसलिए कर दी जाती हैं जिनमें सच्चाई सहन करने का साहस नहीं होता। कलम के सामने कलम से लड़ने की जिनमें हिम्मत नहीं होती। यथार्थ, वैज्ञानिक, तथ्यपरक और प्रमाणित बातों को सुनने का सामर्थ्य जो नहीं जुटा पाते। गौरी लंकेश ही नहीं दाभोलकर, पनसारे और एमएम कलबुर्गी जैसे स्वतंत्र लेखकों की हत्याएं होना और उन पर कार्रवाईयां या सही से जांच न होना इस बात का प्रमाण है कि इस देश का लोकतंत्र मर चुका है। संविधान के मौलिक अधिकारों में जो ‘बात रखने, बोलने और लिखने’ की अभिव्यक्तियां दी जाती हैं वो छिनी जा चुकी हैं। इस तरह की हत्याएं मुल्क के धुले कपड़ों पर खून के धब्बों की तरह है।

गौरी लंकेश का जो आखिरी संपादकीय था वो अगर आपने नहीं पढा हो, तो पढवा देना चाहता हूं। क्योंकि जिस तरह की फर्जी खबरें और ये अंधा-अनुसरण जिस तरह से फैल रहा है वो एक ही जमात के फैलाए लोगों का है। पत्रकार गौरी लंकेश इस संबंध में अपने लेख के बीच लिखती हैं कि “एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गई हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।” अगर आपमें से भी किसीकी उन फ़ेक लोगों की सच्चाई पढने की हिम्मत है तो पूरा संपादकीय जनसत्ता की वेबसाईट के https://www.jansatta.com/national/last-editorial-written-in-gauri-lankesh-patrika-by-gauri-lankesh-and-translated-by-ndtv-india-ex-editor-ravish-kumar-on-his-blog/423526/ इस लिंक को खोलकर पढ़ा जा सकता है।

ये उन्ही लोगों की जमात है जिनका दिमाग तर्क पकड़ने की बजाय जिद्द पकड़ता है, रूढियां पकड़ता है धर्म की मनगढंत बातों को समाज के सामने वैज्ञानिक तरीके से रखने की बजाय उन्हें बढावा देता है, थोपने के षड़यंत्र रचता है। सोचने के तमाम पक्षों में सिर्फ एक पक्ष को मनवाने पर बल देता है। अगर तर्क के नाम पर बातें उनके पास होती है तो कुतर्क के सिवा कुछ नहीं होता। कुतर्क करना एक झूठ के बाद सो झूठ बोलने की तरह ही है, जबकि तर्क ऐसा कथन होता है जिसमें किसी वक्तव्य को सच मानने का कारण दिया होता है।

हमारे तमाम कथन और वक्तव्य एक दिशा में जाने चाहिएं जो समाज को एक सकारात्मक, प्रगतिशील और सच्ची दृष्टि व दिशा दे सकें। सिर्फ मन बहलाने के लिए तर्क करना अपनी हवश के लिए शब्दों का बलात्कार करना भर है। आम वर्ग से संवाद के लिए हरियाणा खास पर मेरी श्रृंखला का ये दूसरा लेख है। पहला लेख भी अगर पढना चाहें तो नीचे के लिंक पर भी क्लिक कर सकते हैं।

क्या धर्म मुझे अच्छी सैलरी दे सकता है ?

मेरे मौजूदा लेख को पढने के उपरांत इस पर अपनी बेबाक राय अवश्य रखें। किसी भी तरह की प्रतिक्रिया, सुझाव और टिप्पणियां सादर आमंत्रित हैं। अगर आप समाज में जागृति लाने के पक्षधर हैं तो इसे जियादा से जियादा विस्तार दें ताकि हमारे आसपास के लोग भी पढ सके जो अधूरे ज्ञान के साथ सोशल-साईटों पर उछलकूद करते हैं।

( लेखक एस.एस.पंवार स्वतंत्र पत्रकार एवं हरियाणा खास के कंटेंट एडिटर है )

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