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मीडिया पर मंडराता आपातकाल का साया

November 7, 2016 10:16 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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जब मोबाइल की वीरेंद्र सहवाग की पहली एड आई तब वे कहते नजर आ रहे थे- कर लो दुनिया मुट्ठी में। मोबाइल से कहीं भी बात कर सकते हो, यही संदेश दिया गया। यह इसलिए याद आ गया क्योंकि इस विज्ञापन के विपरीत सरकार लोगों को अपनी मुट्ठी में ले रही हैं और यह मामला सोशल मीडिया में पूरी तरह छाया हुआ है। वैसे मीडिया को मुट्ठी में लेने के अंगे्रेजों के शासनकाल से ही यह परंपरा जारी है। तभी तो एक समाचार पत्र में उपसंपादक की नौकरी के लिए अंग्रेज सरकार का दंड भुगतने व जेल जाने की योग्यता जरूरी बताई गई थी। फिर स्वतंत्रता के बाद अपना संविधान लागू हुआ और मौलिक अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई, जो निर्विरोध सन् 1975 तक चलती रही। फिर भी जालंधर के समाचार पत्र पंजाब केसरी के समाचारों की आंच न सह पाने पर सरकार ने बिजली की सप्लाई ही काट दी थी और समाचार पत्र के संचालकों ने एक ट्रैक्टर की मदद से, एक प्रकार से जेनरेटर का काम लेते हुआ समाचार पत्र का प्रकाशन जारी रखकर सरकार को आइना दिखा दिया था। यों ऐसे किस्से स्वतंत्रता से पूर्व भी रहे, जब जेल भुगत कर वापस आते ही फिर समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया जाता था। ऐसे ही दोआबा में उड़ारू प्रैस से कहीं भी पैम्फलेट प्रकाशित कर गदरी यानी अंग्रेज सरकार की नजर में देशद्रोही इनको गुप्त तरीके से जनता में बांटते थे। तभी तो यह बात लोकप्रिय हुई थी। 

 

खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो

जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो। 

 

फिर आया आपातकाल। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे काला अध्याय लिखा गया। सेंसर बिठा दिए समाचार पत्रों के कार्यालयों में, समाचारों की कांट-छांट के लिए कर्मचारी, जो यह भी नहीं जानते थे कि कलम की ताकत कितनी है। समाचार पत्रों ने विरोध में संपादकीय की जगह खाली छोडऩी शुरू कर दी। तब निजी चैनल नहीं थे। इसलिए समाचार पत्रों से ही खतरा था और उनके पंख काट दिए गए थे। अब जमाना बदल गया। समाचार पत्रों से ज्यादा निजी चैनलों का प्रसार तंत्र है। वह भी लगातार चौबीस घंटे। हर बड़ा नेता चैनलों पर चेहरा दिखाने को लालायित है पर अपने विरुद्ध समाचारों को रोकने के लिए यथासंभव उपाय खोजता है। विपक्ष में रहते जो मीडिया मन को भाता, लुभाता है, सत्ता में आते ही उसी मीडिया पर सच आने का डर क्यों सताने लगता है

 

ऐसा ही कुछ अब भी होने लगा है। एनडीटीवी इंडिया चैनल पर एक दिन के प्रसारण पर नौ नवंबर को रोक लगाने के आदेश दिए गए हैं। इसे सभ्य भाषा में ऑफ एयर रहने की बात कही जा रही है। इल्जाम यह कि पठानकोट के एयरबेस पर हुई कवरेज में देशहित और सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा गया। बड़ी देर की मेहनबान आते-आते। सूचना व प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू ने यही कारण बताया है। अब सरकार ने असम के भी दो न्यूज चैनलों को ऑफ एयर रहने के आदेश दे दिए हैं। इनमें न्यूज टाइम असम शामिल है, यह चैनल भी नौ नवंबर को बैन रहेगा। असम के एक न्यूज  चैनल केयर वल्र्ड को भी ऑफ एयर रहने के आदेश हैं लेकिन एक दिन नहीं, एक सप्ताह के लिए। इस चैनल पर लगातार कार्यक्रम दिशा निर्देश का उल्लंघन करने का दोष लगाया गया है। वेंकैया नायडू फील गुड करवाते हुए कहते हैं कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा सम्मान करती है लेकिन देशहित व सुरक्षा के मुद्दों का राजनीतिकरण भी तो अच्छा नहीं है। अभी तो मीडिया के अच्छे दिनों की शुरूआत हुई है। आगे-आगे देखिए कितने अच्छे दिन आने वाले हैं। 

 

पंजाबी कवि सुरजीत पातर कहते हैं:-

 कुज्ज किहा तां हनेरा जरेगा किवें,

चुप्प रिहा तां शमादान की कहणगे। 

लेखक परिचय

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लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर ।

उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहायस हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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