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खेल खास – खिलाड़ी पेड़ पर नहीं उगते उन्हें बनाना पड़ता है?

August 19, 2017 11:07 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

दक्षिण अफ्रीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति और रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला ने खेलों के बारे में कहा था कि खेलों में बदलाव की शक्ति होती है। खेल में प्रेरणा देने की शक्ति होती है, इनमें लोगों को जोड़ने की शक्ति होती है, न सिर्फ लोगों को बल्कि देशों को जोड़ने की ताकत भी खेलों में होती है। लेकिन भारत में प्राचीन समय से ही खेल-कूद को सिर्फ व्यायाम का एक माध्यम माना गया है जो अच्छी सेहत के लिये आवश्यक होते हैं लेकिन साथ ही व्यावसायिक नज़रिये से खेलों के प्रति कोई उत्साहजनक नज़रिया नहीं रहा है और खेलों को खराब करने वाला बताया जाता रहा है कहावत भी प्रचलित है पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे तो होंगे खराब। खेलों प्रति जहां इस तरह मान्यताएं लोक प्रचलित हों वहां पर खेलों में श्रेष्ठ प्रदर्शन या फिर बढ़-चढ़कर भागीदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? या फिर कह सकते हैं कि आखिर कैसे जमीनी स्तर पर इस तरह की सोच से खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिल सकता है? आइये जानते हैं खेलों में झूझते भारत की दास्तान। समझते हैं खिलाड़ियों को प्रोत्साहन न मिलने के कारण और तलाशते हैं उम्मीद की किरणों को।

भारत में खेलों के प्रति रूझान

दंगल फिल्म का यह डायलॉग काफी प्रसिद्ध हुआ था कि मेडलिस्ट पेड़ पर नहीं उगते, उन्हें बनाना पड़ता है, प्यार से, मेहनत से, लगन से यह विचार मेडलिस्ट ही नहीं बल्कि हर खिलाड़ी के लिये प्रासंगिक है। खिलाड़ियों को बनाना पड़ता है, उनके लिये खेल के अनुकूल वातावरण तैयार करना पड़ता है। आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवानी पड़ती हैं। यूसी वी मीडिया के अनुमान के मुताबिक भारत में दस में से एक व्यक्ति खेल में करियर बनाने के बारे में सोचता है। हालांकि सोचने से आगे बढ़कर खेल में करियर कितने खिलाड़ी बना पाते हैं यह खेल कोटे से भर्ती हुए खिलाड़ियों या फिर खेलों में राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेडल पाने वाले खिलाड़ियों की संख्या से जाना जा सकता है। एक प्रतिष्ठित समाचार पोर्टल के मुताबिक 125 करोड़ की आबादी वाले देश में मात्र 5 करोड़ युवाओं को ही खेल सुविधाएं पंहुचती हैं। जबकि बतौर करियर खेल को 12.5 करोड़ लोग चुनना चाहते हैं। अर्थात 7.5 करोड़ खिलाड़ी खेल में करियर बनाने के इच्छुक तो हैं लेकिन उन तक सुविधाओं व संसाधनों की पंहुच नहीं है। उनके सपने अंतत: मिट्टी में ही मिल जाते हैं और रोजी-रोटी के चक्कर में प्रतिभाओं का दमन हो जाता है।

क्यों नहीं मिल पाता खिलाड़ियों को प्रोत्साहन?

खेल खेल में खेल – प्राचीन समय से लेकर वर्तमान तक जहां हम विविधता के वाहक है तो वहीं भेदभाव की दास्तानें भी चली आ रही हैं और यह सिर्फ मानवीय समाज में नहीं बल्कि शिक्षा, कला से लेकर खेलों तक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में देखने को मिलता है। एक धर्म दूसरे से खुद को श्रेष्ठ बताता है, एक जाति दूसरी से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगी रहती है, एक व्यक्ति दूसरे को अपने सामने कुछ समझता ही नहीं है उसी प्रकार एक खेल को दूसरे से बेहतर बताया जाता है और फिर उसी को सिरमोर माना जाता है और अन्य खेल चाहे वह हमारा राष्ट्रीय खेल ही क्यों न हों तवज्जो पाने के लिये उसे किसी बड़ी उपलब्धि को हासिल करने की आवश्यकता होती है।

खेलों में करियर की संभावना – खेलों से सेहत बढ़िया रहती है यह तो सभी जानते हैं और मानते हैं लेकिन खेल रोजगार का जरिया भी बन सकते हैं इस पर पूर्णत: आत्मविश्वास कर आश्वस्त होने में अभी भी झिझक है। खेलों में करियर के इच्छुक सभी खिलाड़ियों को सफलता नहीं मिलती कई बार तो योग्यता होने के बावजूद भी येन केन प्रकारेण प्रतिभावान खिलाड़ी को सियासती दांवपेंचों के चलते मात खानी पड़ती है। हालांकि वर्तमान में खेलों को रोजगार का जरिया माना जाने लगा है और सरकार भी उपलब्धि के पश्चात खिलाड़ियों को योग्यतानुसार रोजगार दे देती है लेकिन अभी इन प्रयासों को बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता।

खेल सुविधाओं की पंहुच – सवा सौ करोड़ आबादी वाले जिस देश में लगभग 70 करोड़ लोगों की आयु 35 वर्ष से या इससे कम हो तो समझा जा सकता है इनके लिये खेलों की सुविधा मुहैया होनी कितनी आवश्यक है लेकिन सुविधाएं मिल कितनों को पाती हैं सिर्फ 5 करोड़ को। एनसीईआरटी का एक सर्वे बताता है कि देश के 10 लाख स्कूलों में से आधे स्कूलों के पास तो खेलने के मैदान तक नहीं हैं विशेषकर शहरी क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा है।

भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार तो हर क्षेत्र में देश के विकास में अवरोधक बनकर तना खड़ा है फिर खेल इससे कहां अछूते हैं। दिल्ली में आयोजित हुए राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को ही लिजीये 76000 करोड़ के घोटाले के आरोप हैं। ऐसे में कैसे आप खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद कर सकते हैं। इतना ही नहीं खेलों के विकास के लिये राज्य और केंद्र स्तरीय योजनाएं भी सफेद हाथी साबित होती हैं। चौथी दुनिया नामक वेब पोर्टल के अनुसार पूर्ववर्ती युपीए सरकार ने 2008-09 में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों के प्रोत्साहन के लिये पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान (पीवाईकेकेए) की शुरुआत की। इसके तहत अगले दस साल में गांव व ब्लॉक स्तर पर खेल के मैदान विकसित होने थे ताकि ग्रामीण स्तर से ब्लॉक, जिला, राज्य, राष्ट्रीय स्तर तक खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन हो सके और हुनरमंद खिलाड़ियों को उचित अवसर उपलब्ध हो सकें। लेकिन 2013 में जब संसद में इस पर सवाल पूछा गया तो खेल मंत्री ने बताया कि कुल 60421 ग्राम पंचायतों व 1852 ब्लॉक पंचायतों में इस योजना के तहत मैदानों के निर्माण की स्वीकृति दी गई है और पिछले छह सालों में 786.5 करोड़ इस पर खर्च भी हुए हैं। अधिकतर राज्यों में इसे मनरेगा के साथ जोड़ा गया नतीजा ढाक के तीन पात अधिकतर इलाकों में सरकारी स्कूलों में मौजूद मैदानों के गड्डों को थोड़ा बहुत भरकर कागजी कार्रवाई पूरी कर दी। जबकि जमीनी स्तर पर अधिकतर मैदान आपको ढूंढे से नहीं मिलेंगें और जो बने थे वे भी एक बारीश ने पहले जैसे कर दिये।

उम्मीद की किरण क्या है?

भारत एक महान देश है क्यों क्योंकि इतना भ्रष्टाचार, इतनी विविधता होने के बावजूद भी यह निरंतर तरक्की के पथ पर आगे बढ़ रहा है ऐसे में निराश होने की तो हमें कतई आवश्यकता नहीं है हां थोड़ा समय लगेगा लेकिन हालात बेहतर ही होंगे। इसका परिणाम हम पिछले कुछ समय से देश में खेलों के प्रति बढ़ते रूझान से देख सकते हैं। खेल संस्थाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ भी धीरे-धीरे माहौल बन रहा है और हो सकता है भविष्य में राजनेता इस दबाव को महसूस भी करें और योग्य खिलाड़ियों को ही इन पदों को सौंपा जाये।

एक सुखद अहसास तब भी होता है जब पुरुष क्रिकेट के साथ-साथ महिला क्रिकेट खिलाड़ियों की उपलब्धियों को भी जगह मिलने लगी। जब क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों का भी व्यावसायिकरण होने लगा। प्रो कब्बडी लीग, फुटबाल और हॉकी जैसे खेलों के प्रति भी रूझान बढ़ा है। बिजेंद्र जैसे बॉक्सर ने व्यावसायिक बॉक्सिंग का रास्ता भी दिखाया है। टेनिस, बैडमिंटन, जिमनास्टिक, तीरंदाजी आदि कई प्रतिस्पर्धाओं में हमारे पास कुछ आदर्श खिलाड़ी हैं।

मीडिया से लेकर टी.वी सिनेमा तक खिलाड़ियों को प्रोत्साहित कर रहा है। चक दे इंडिया, दंगल जैसी बेहतरीन फिल्मों से भी लोग खेलों के प्रति जागरुक तो खिलाड़ी प्रेरित हुए हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं संघर्षों के बाद ही सही खेलों में भारत का भविष्य सुनहरा होने की उम्मीद कर सकते हैं।

खेल खास – खिलाड़ी पेड़ पर नहीं उगते उन्हें बनाना पड़ता है? Reviewed by on . दक्षिण अफ्रीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति और रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला ने खेलों के बारे में कहा था कि खेलों में बदलाव की शक्ति होती है। खेल में प्रेर दक्षिण अफ्रीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति और रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला ने खेलों के बारे में कहा था कि खेलों में बदलाव की शक्ति होती है। खेल में प्रेर Rating: 0

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