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यूपी में न बुआ, न भतीजा, कीचड़ में खिल सकता है कमल

November 1, 2016 4:42 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले मंच नहीं बल्कि रंगमंच पूरी तरह सज चुका है। पहले बसपा सुप्रीमो मायावती और भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह के बीच खूब वाक्युद्ध चला, जिसके चलते दयाशंकर सिंह को तो पद गंवाना पड़ा और जेल की हवा भी खानी पड़ी लेकिन इसी हंगामे के दौरान दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को मीडिया की इतनी कवरेज मिली, जिससे कि उन्हें भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा का अध्यक्ष पद दे दिया गया। वैसे भाजपा ने दयाशंकर सिंह को पृष्ठभूमि में डाल दिया लेकिन स्वाति सिंह को ऊंचा उठा दिया, इतना ऊंचा उठा दिया कि वे बसपा सुप्रीमो मायावती को ललकार रही हैं कि वे उनके खिलाफ यूपी में कहीं से भी चुनाव लडऩे को तैयार हैं। 

 

कुछ इसी हंगामे के बीच कांग्रेस ने राज बब्बर, गुलाम नबी आजाद व शीला दीक्षित की बस यात्रा चलाई, जिसमें शीला दीक्षित तो जल्दी बीमार होकर लौट आई पर राज बब्बर ने यात्रा पूरी की। फिर पहुंचे बाबा राहुल गांधी- खाट सभाओं के साथ किसान यात्रा के लिए। खाटें लुटती रहीं, यात्रा चलती रही। यात्रा का फल दिल्ली में समापन स्वागत रैली में यह मिला कि हरियाणा कांग्रेस के हुड्डा-तंवर गुट आपस में भिड़ गए। ऐसे भिड़े कि अभी तक पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे इसकी जांच में जुटे हैं और नेता अपने-अपने सबूत पेश कर रहे हैं। मानो कांग्रेस अदालत चल रही हो। सबसे बड़ा परिणाम तो इस यात्रा के बाद यह निकला कि यूपी प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने हाथ को छिटक कर अमित शाह की मौजूदगी में ‘कमल’ थाम लिया। इससे पहले कुछ कांग्रेसी, कुछ बसपा तो कुछ सपा विधायक अपनी-अपनी पार्टियों को अलविदा कह कर, भाजपा में शामिल हो चुके थे। इन सबको अपनी पार्टियों में बड़ी घुटन महसूस होने लगी थी, इसलिए ताजी हवा में कमल का फूल सूंघने पर बड़ी राहत महसूस की। 

 

अब समाजवादी पार्टी ने रंगमंच पर ऐसा महाड्रामा पेश किया, जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी। कभी राजनीति की शतरंज इतनी खुलेआम नहीं खेली गई थी, जितनी सपा ने सारे देश को खेलकर दिखाई। कभी चाचा शिवपाल भतीजे अखिलेश के समर्थकों को अनुशासनहीनता के नाम पर पार्टी से निकालते तो कभी अखिलेश मंत्रियों को बर्खास्त करते-करते चाचा शिवपाल को भी बर्खास्त कर गए। कभी मुलायम सिंह रोये, कभी बेटे अखिलेश रोये। चाचा-भतीजा लड़े और ऐसे लड़े कि देश देखे। भतीजा पांव छूने झुके, चाचा धक्का दे दे। 

 

भतीजा माइक पर कुछ कहना चाहे, चाचा माइक ही छीन ले और कहे कि मुख्यमंत्री झूठ बोल रहे हैं। ऐसा रंगमंच, ऐसा अभिनय, ऐसे संवाद और कहां। पार्टी रजत जयंती समारोह मनाने से पहले शिवपाल दिल्ली में न्यौता देने गए हैं। महागठबंधन बनाने के लिए। बिहार में भी महागठबंधन बनाया था, मुलायम सिंह यादव अध्यक्ष बनाए गए थे, फिर एकाएक पीछे हट गए पर बिहार में महागठबंधन जीत गया। अब उसी महागठबंधन की याद सता रही है। अमर सिंह को दलाल कहे जाने का बहुत मलाल है पर वे मुलायम के बेटे अखिलेश के साथ हैं, मुख्यमंत्री के साथ नहीं। कहीं सीएम आवास में विधायक को चांटा मारने का दृश्य है तो बदले में मंत्री पवन को एसपी से बर्खास्त करने का जवाबी हमला। चाचा-भतीजा और बसपा पर चुटकी लेते इसलिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इटावा में कह रहे हैं कि न बुआ आएगी, न भतीजा, अबकी बार आएगी भाजपा। कांग्रेस की मुख्यमंत्री प्रत्याशी शीला दीक्षित को त्रिशंकु विधानसभा की आशंका है। यानी भाजपा, बसपा, सपा भी नहीं बल्कि कोई महागठबंधन ही यूपी में नई सरकार बनाएगा। यह तो जनता का मूड ही बताएगा या अयोध्या वाले रामलल्ला ही बताएंगे कि क्या होगा यूपी में, फिलहाल रंगमंच और शतरंज का खेल जारी है। 

 

समाजवादी पार्टी पर तो यही कह सकते हैं:-

ताश के पत्तों सी, सजी है यह पार्टी,

कोई आज तो कोई कल जाने के लिए

लेखक परिचय

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लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर ।

उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहायस हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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