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यूपी चुनाव – विचारधारा पर नहीं चुनाव मैनेजरों पर विश्वास

February 7, 2017 10:14 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, यह गाना बहुत मशहूर है पर उत्तरप्रदेश के नेता जी मुलायम सिंह यादव इस के उलट कह रहे हैं कि बेटे अखिलेश, यह क्या कर रहे हो? कहीं गब्बर सिंह की तरह यह डायलाग ना बोल दें कि अखिलेश मेरा नाम माटी में मिला दोगे क्या? कांगेस के साथ गठबंधन क्यों किया? इसकी जरूरत ही क्या थी? समाजवादी पार्टी अकेले ही सरकार बनाने में सक्षम थी, फिर कांगेस से हाथ मिलाने की क्या जरूरत रह गई थी? मुलायम सिंह तो लखनऊ में हुए रोड शो से भी बुरी तरह खफा हो गए थे और यहां तक कह दिया था कि अब मैं समाजवादी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने नहीं जाऊंगा। जिन समाजवादी पार्टी नेताओं को टिकट नहीं मिलेंगे,वे कहां जाएंगे? पांच साल वे क्या करेंगे? यानि नेताजी को समाजवादी नेताओं के बेराजगार होने की चिंता है और युवाओं के बेरोजगार होने की चिंता नहीं? मजेदार बात है कि अखिलेश और राहुल की जोड़ी के प्रचार के लिए चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर ने नया नारा तैयार किया है- यूपी को ये साथ पसंद है। खैर अब तो मुलायम भी कुछ मुलायम पड़ गए हैं और उन्होंने भी कह दिया है कि जब गठबंधन किया है तो स्वीकार तो करना ही होगा और प्रचार भी करूंगा।  हालांकि शुरूआत अपने भाई शिवपाल के क्षेत्र जसवंतनगर से करेंगे। ये वहीं शिवपाल हैं जो नामांकेन पत्र भरने के बाद समर्थकों के बीच कह चुके हैं कि बड़ी मेहरबानी हुई, जो पार्टी का टिकट मिल गया वरना वे तो निर्दलीय चुनाव लडऩे की सोच रहे थे। अब 11 मार्च को अखिलेश अपनी सरकार बनाएं और हम अपनी पार्टी बनाएंगे। हम नेता जी के साथ ही रहेंगे और उन्होंने यहां तक कह दिया कि अभी तो पार्टी नहीं है, लेकिन मुलायम के लोगे के नाम से लोगे चुनाव में उतरेंगे।

                इस सब से बेपरवाह अखिलेश-राहुल की जोड़ी ने लखनऊ के बाद आगरा में भी लगभग 8 घंटे रोड शो किया। दोनों चुनाव से पहले एक दूसरे को अच्छा लड़का कहते थे, आखिर दोनों अच्छे लड़के एकजुट हो गए। इस तरह साइकिल का एक पहिया समाजवादी पार्टी का है, दूसरा कांगेस का। यानि पापा मुलायम और चाचा शिवपाल का पहिया निकाल कर कांगेस का पहिया फिट कर दिया गया। वैसे ये जुगाड़तंत्र हरियाणा में ज्यादा चर्चित है। अब यूपी में यह साइकिल कितना तेज चलेगा?

                मीडिया को अखिलेश और राहुल ने इस गठबंधन को गंगा-यमुना का संगम बताया। वैसे भी संगम इलाहाबाद में ही है और यह संगम व अच्छे लड़कों का साथ क्या गुल खिलाएगा, यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा। इस बीच अखिलेश और राहुल ने प्रबंधक प्रशांत किशोर के बनाए पहले नारे को पसंद नहीं किया। यह नारा था यूपी के दो लड़के बनाम बाहरी मोदी, बात भी सही है प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी से सांसद हैं, फिर बाहरी कैसे? वैसे भी अपने देश में बाहरी कौन? कभी सोनिया गांधी को विदेशी मूल कह कर विरोध किया जाता था, पर जनता ने उन्हेे हमारी बहू कह कर।

                इधर एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाकर कांगेस के कनार्टक के पूर्व मुख्यमंत्री एमएस कृष्णा पार्टी को अलविदा कह गए। सवाल यह उठाया कि अब कांगेस को नेताओं की नहीं, चुनाव मैनेजरों की जरूरत है। कृष्णा को वयोवृद्ध होने पर पार्टी से दरकिनार किए जाने का दुख है। प्रशांत किशोर की सेवाओं पर कांगेस को इतना भरोसा क्यों? नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन प्रशांत किशोर लाए, बिहार में नीतिश कुमार को दोबारा लाने का क्षेय भी पीके को मिला। फिर कांगेस ने यूपी में पीके की सेवाएं ली और उन्हें खाट सभाओं से समझ आ गया कि कांगेस की दाल नहीं गलने वाली। इस लिए समाजवादी पार्टी और कांगेस का गठबंधन करवाने में जुट गए और सफल भी रहे। इस तरह पीके का करिश्मा भी बचा रहेगा। कृष्णा का सवाल जायज है कि अब राजनीतिक दलों को अपनी नीतियों, विकास और विचारधारा पर नहीं बल्कि चुनाव मैनेजरों पर भरोसा क्यों?

लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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