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रामायण के रचयिता ब्राह्मण या भील

October 14, 2016 10:22 am by: Category: खबर खास, तीज तयोहार, शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती के नजदीक आते ही तमाम नेता उन्हें याद करने लगते हैं… जयंती के दिन अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन प्रकाशित किये जाते हैं। समारोह का आयोजन किया जाता है.. सही है होने भी चाहिये आखिर वाल्मीकि अपने दौर के एकमात्र ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने उस पौराणिक त्रेता युग में संस्कृत के विद्वान होने का साहस किया जिस युग में वंचित तबकों को ज्ञान हासिल करने का अधिकार नहीं था।

वाल्मीकि का जीवन

महर्षि वाल्मीकि के जीवन परिचय और उससे जुड़ी कहानियों से सब वाकिफ हैं। कैसे उनका हृद्य परिवर्तन हुआ… कैसे वे आदि कवि कहलाये और कैसे कहलाये वाल्मीकि। कहानियों के अनुसार उनका जन्म ऋषिकुल में हुआ लेकिन वे पले बढ़े भील समुदाय में, पेशा अपनाया डकैती का लेकिन जब उन्हें बताया गया कि यह पाप कर्म है तो उन्होंनें अपने परिवार से विचार विमर्श कर इसे त्याग भी दिया। अब सवाल ये है कि वाल्मीकि जी ने अपना कर्म छोड़ दिया और भक्ति में लीन हो गये लेकिन जो परिवार उन पर निर्भर था उसकी रोजी-रोटी कैसे चली या फिर वो भूखे मरने पर मजबूर हुये। दूसरा उन्हें प्रचेता की संतान बताया जाता है जिनका पिछली पीढ़ियों में जाने पर ब्रह्मा से सीधा संबंध स्थापित किया जाता है और अंतत: महर्षि वाल्मीकि को ब्राह्मण कुल का ठहरा दिया जाता है। कहा जाता है कि उन्हें एक भीलनी ने चुरा लिया था जिसके बाद वे भील समुदाय में पले बढ़े।

अपनी कठिन तपस्या से जब दीमक ने उन्हें ढक लिया और जब भगवान प्रसन्न हुए तो वे वाल्मीकि कहलाये… कामरत क्रोंच पक्षियों में से व्याध द्वारा एक की हत्या करने व दूसरे के विरह में तड़प कर प्राण त्यागने के दारुण दृश्य को देखकर उनके मुख से आदि श्लोक निकला जिसके बाद वे आदि कवि कहलाये… कहा जाता है इसके बाद ब्रह्मा ने उनकी प्रतिभा को देखकर उन्हें रामायण लिखने के लिये प्रेरित किया।

प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों को ब्राह्मण घोषित क्यों किया जाता है

इतिहास पौराणिक हों या असल वंचित तबकों से जो भी प्रतिभाएं निकली हैं उन्हें किसी न किसी बहाने उन तबकों से अलग करने के प्रयास किये जाते हैं। विशेषकर वाल्मीकि… कबीर.. और रविदास इसके बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं। तीनों वंचित समुदाय में पले बढ़े लेकिन अंतत: किसी न किसी बहाने उन्हें ब्राह्मण समुदाय के सांचे में ढालने के प्रयास हुए हैं। वाल्मीकि का प्राचेतस होना, कबीर का विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा होना और रविदास के तन से चमत्कारिक रुप से जनेऊ का निकलना उन्हें ब्राह्मण बनाने की ही कोशिश नजर आती है।

वाल्मीकि की संताने

वहीं अगर जिन वंचित समुदायों से वाल्मीकि जैसी प्रतिभाएं निकली वे समुदाय आज भी मैला ढ़ोने को मजबूर हैं… त्रेता से लेकर कलयुग और कलयुग में भी आदिकाल से लेकर आधुनिक काल और पहली शदी से लेकर इक्कीसवीं सदी आने तक इन वंचित समुदायों के जीवन स्तर में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। कुछ लोगों को छोड़कर बहुतायत समाज आज भी बदहाली का जीवन जी रहा है। उनके नसीब में गंदगी के वातावरण में ही जीवन का निर्वाह करना है। वे आज भी शहर या गांव की सीमाओं से बाहर रहते हैं जहां सारे शहर या गांव का कीचड़ डाला जाता है।

अगर वाल्मीकि न होते

सोचो अगर वाल्मीकि न होते तो रामायण नहीं होती और रामायण नहीं होती तो रामचरित मानस भी नहीं होता और अगर ये नहीं होते तो फिर राम नहीं होते रावण नहीं होता, रावण का वध नहीं होता दशहरा नहीं होता, जीत के बाद राम की वापसी नहीं होती और दीवाली नहीं होती। फिर रामजन्म भूमि भी नहीं होती और ना ही बाबरी का विध्वंस नहीं होता…. हो सकता है फिर वाल्मीकि की संताने भी मैला नहीं ढोती।

रामायण के रचयिता ब्राह्मण या भील Reviewed by on . महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती के नजदीक आते ही तमाम नेता उन्हें याद करने लगते हैं... जयंती के दिन अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन प्रकाशित किये जाते हैं। समारोह का महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती के नजदीक आते ही तमाम नेता उन्हें याद करने लगते हैं... जयंती के दिन अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन प्रकाशित किये जाते हैं। समारोह का Rating: 0

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