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क्या वाल्मीकि, कबीर व रैदास के साथ खड़े हो सकते हैं ?

October 5, 2017 4:58 pm by: Category: शख्सियत खास 1 Comment A+ / A-

आज वाल्मीकि जयंती है। पूरे देश मे सरकार इसे धूमधाम से मना रही है। जगह-जगह सरकार कार्यक्रम कर रही है। पिछले 2-3 दिनों से वाल्मीकि जयंती की बधाइयों व कार्यक्रमो के सन्देश भी सोशल मीडिया पर अलग-अलग दलित संगठनो की तरफ से भी आ रहे थे। कार्यक्रम का जो पोस्टर उन्होंने जारी किया है। वो बहुत खतरनाक है। ये खतरनाक क्यों है, भविष्य में इसके क्या दुष्परिणाम आएंगे इस पर जरूर प्रगतिशील तबके को सोचना चाहिए। इन प्रोग्रामो के पोस्टरों पर क्रांतिकारी निर्गुण विचारधारा के सन्तो जिनका सम्बन्ध दलित समुदायों के साथ रहा है सन्त कबीर, सन्त रविदास, दलितों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले डॉ भीम राव अम्बेडकर, शिक्षा की अलख जगाने वाले महात्मा फूले, ज्योतिबा फुले व महात्मा बुद्ध के फोटो के साथ वाल्मीकि का फोटो लगाया गया है। सन्त वाल्मीकि को आज निर्गुण क्रांतिकारी सन्तो के साथ जोड़ना, उनके साथ दिखाना, उनके साथ खड़ा करना क्रांतिकारी सन्त धारा के साथ गद्दारी करना है। सन्त रविदास, कबीर, नानक जिन्होंने पाखंड, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी। समाज में बराबरी हो इसके लिए लड़ाई लड़ी। कोई भूखा न सोये इसके लिए लड़ाई लड़ी।

ऐसो चाहू राज मैं जहां मिले सबन को अन्न।

ऊंच नीच सब सम बसें रविदास रहै प्रसन्न।।

लेकिन वाल्मीकि ने कोई ऐसा क्रांतिकारी काम नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने राजा राम का गुणगान किया। अपनी कलम राजा के गुणगान में लगाई। उस समय की आम जनता के हालात क्या थे उनके बारे में कुछ नही लिखा। गैर बराबरी के खिलाफ कुछ नही लिखा। राम राज्य जिसमें शुद्र को शिक्षा का अधिकार नही था। राजा राम ने सन्त शम्भूक को इसलिए मार दिया क्योकि वो शिक्षा ले भी रहा था और शूद्र समाज को दे भी रहा था। ऐसे घिनोने कृत्य की वाल्मीकि ने कही भी निंदा या विरोध नही किया है। इस असमानता के खिलाफ वाल्मीकि ने एक शब्द भी नही लिखा। राम ने जब सीता को घर से निकाल दिया उस समय उसके पेट मे बच्चा था। राम के इस अमानवीय फैसले के खिलाफ वाल्मीकि ने कलम नही चलाई।

लेकिन आज कुछ राजनीतिक स्वार्थी लोग व उनकी पार्टियां  सन्त वाल्मीकि को क्रांतिकारी सन्तो के साथ खड़ा करने पर तुली हुई है। एक तरफ तो ऐसे लोग राम राज्य का बहिष्कार करते है। हिंदुइज्म की खिलाफत करते है वही राजनीतिक स्वार्थ के लिए हिन्दू धर्म के आधार राम और उसका राज्य रामराज्य पर ग्रन्थ लिखने वाले वाल्मीकि को क्रांतिकारी साबित करने पर तुले हुए है। अगर इनकी नजर से वाल्मीकि क्रांतिकारी लेखक या सन्त थे तो उसके द्वारा लिखी गयी रामायण भी क्रान्तिकारी ग्रन्थ है। रामराज्य की अवधारणा भी फिर तो सही है।

एक तरफ तो आप राम और उसके राज्य रामराज्य का विरोध करते हो दूसरी तरफ रामराज्य को जस्टिफाई करने वाले लेखक को आप क्रांतिकारी की श्रेणी में लाना चाहते हो। ये दोनों विपरीत होते हुए एक कैसे हो सकती हैं। अगर वाल्मीकि क्रांतिकारी कवि होते तो सन्त रविदास, कबीर, नानक की वाणियो में मिलते, महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर उनको आदर्श के रूप में बोलते हुए या लिखते हुए कोट करते।

इसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ किसके जुड़े है। ये जानना भी बहुत जरूरी है। इसके पीछे सबसे बड़ा स्वार्थ हिंदूवादी विचारधारा की पार्टियों और उनके संगठनों का है। 1920 के दौर में जब अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक विभाजन को हवा दी और देश में हिन्दू और मुस्लिम गोलबंदी होनी शुरू हो गई थी। तब देश मे अम्बेडकर साहब भी दलितों को एकजुट कर रहे थे, तब हिन्दू खडपंचों के कान खड़े हो गए कि अगर दलित भी हिंदुओं (तथाकथित स्वर्ण जातियों) के खिलाफ खड़े हो गए तो स्वर्ण जातियां अल्पसंख्यक हो जाएंगी और देश से ब्राह्मणवादी सामन्तवाद का खात्मा हो जाएगा। इसलिए उस समय दलितों को ब्राह्मणी खेमे में बनाये रखने के लिए उन्हें कुछ प्रतीकों के पीछे समेटने की साजिशें शुरू हुई जिसके तहत सफाई कर्म करने वाली जातियों को वाल्मीकि का वंशज दिखाया गया। जरा सोचिए कि वाल्मीकि ने हमेशा राम का ही गुणगान किया। जैसे रविदास ने जातिप्रथा और ब्राह्मणी पाखण्डों का विरोध किया वैसा जबरदस्त विरोध वाल्मीकि लेखन में कहीं नहीं मिलता केवल दो जगह निषाद द्वारा राम को नदी पार कराते और भूखे राम द्वारा जान बचाने के लिए शबरी के झूठे बेर खाते हुए जातीय सहयोग उसमें दिखाया गया है। इसलिए हिंदूवादी तो चाहते ही है कि दलित समुदाय वाल्मीकि को अपना क्रांतिकारी सन्त मान ले। जिस दिन आप वाल्मीकि को क्रांतिकारी सन्त का दर्जा दे दोगे तो आप उसकी लिखी हुई रामायण और रामायण के हीरो राजा राम व उसके रामराज्य को सही मानने लग जाओगे। असमानता के खिलाफ, ऊंच-नीच के खिलाफ, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता के खिलाफ जो लड़ाई क्रांतिकारी सन्तो, महापुरुषों ने लड़ी थी वो खत्म हो जाएगी।

दूसरा स्वार्थ बसपा और उसके सांझेदार संघठनो का है। क्योकि बसपा ओर इन संघठनो पर दलितो में खास एक जाति का प्रभाव रहा है। वाल्मीकि जाति कभी भी इनके पक्ष में नही आई। अब वाल्मीकि जाति को साथ लाने के लिए ये रविदास, कबीर, वाल्मीकि, डॉ अम्बेडकर को एक साथ खड़ा करना चाहते है। जो आने वाले समय मे खतरनाक साबित होगा।

इस बारे में दलितो के लिए लड़ने वालों का तर्क भी अजीब है कि वाल्मीकि समुदाय को दलित-पिछड़ो की एकता में साथ लाना है तो उनके आराध्य वाल्मीकि जिसके साथ इस समुदाय कि भावनाएं जुड़ी हुई है। इनकी भावनाओ को ठेस कैसे पहुंचाई जा सकती है। ये ऐसा कुतर्क है जो इन्होंने अपने फायदे के लिए इसको बनाया है। इस कुतर्क को इस्तेमाल करके भविष्य में ये किसी को भी साथ ले आएंगे।

जो दलित तबका आज सबसे ज्यादा भेदभाव और शोषण का शिकार है। आज उसके उत्थान और विकास के बारे में कोई क्रांतिकारी एजेंडा न लाकर उसे हिन्दू धर्म के जाल में उलझाए रखने के लिए ही उसे वाल्मीकि जयंती व वाल्मीकि सत्संगों में धकेला जा रहा है।

आज सालाना हजारों सफाईकर्मी बिना आधुनिक मशीनों के गटर में काम करते हुए जहरीली गैसों से मरते हैं लेकिन इस देश मे उस पर कोई चर्चा नहीं होती क्योंकि हमें भाग्यवाद और भगवान में ही धक्का दिया जा रहा है ताकि हम बुनियादी सवालों को न उठा सके। शासक वर्गों के इस कार्य मे ऋषि वाल्मीकि काफी सहायक हैं।

आपको अगर दलितो को एकजुट करना है उस एकजुटता में वाल्मीकि समुदायों को भी साथ लाना है तो उनकी जो समस्याये है उन पर बात की जानी चाहिए, मैला ढोने, गटर के अंदर जाकर सफाई के खिलाफ, हर साल गटर में मरने वाले सफाई कर्मचारियों के लिए लड़ना चाहिए,  उनकी सैलरी के लिए, काम पर सुरक्षा, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए लड़ना चाहिए। दलित उत्पीड़न के खिलाफ, दलितों की सांझी समस्याओ, भूमि बंटवारे, आरक्षण, रोजगार की समस्याओं पर बात करके ही दलितो व पीड़ितों की एकता स्थापित की जा सकती है व  इस एकता में वाल्मीकि समुदाय को साथ लाया जा सकता है।  सफाई कर्म करने वाले मजदूर भाइयों को इस जाल से निकल कर क्रांतिकारी राह पर चलना चाहिए।

ये लड़ाई का रास्ता भविष्य में मुक्ति के रास्ते की तरफ ले जाएगा।

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लेखक परिचय

उदय चे स्वतंत्र लेखक हैं एवं सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दलित एवं पीड़ितों के हक की आवाज़ के लिये अपने संगठन के माध्यम से उठाते रहते हैं। उदय चे हिसार के हांसी में रहते हैं।

 

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

क्या वाल्मीकि, कबीर व रैदास के साथ खड़े हो सकते हैं ? Reviewed by on . आज वाल्मीकि जयंती है। पूरे देश मे सरकार इसे धूमधाम से मना रही है। जगह-जगह सरकार कार्यक्रम कर रही है। पिछले 2-3 दिनों से वाल्मीकि जयंती की बधाइयों व कार्यक्रमो क आज वाल्मीकि जयंती है। पूरे देश मे सरकार इसे धूमधाम से मना रही है। जगह-जगह सरकार कार्यक्रम कर रही है। पिछले 2-3 दिनों से वाल्मीकि जयंती की बधाइयों व कार्यक्रमो क Rating: 0

Comments (1)

  • Prashant kumar

    वाल्मीकि जयंती आई तो कुछ लोग महर्षि वाल्मीकि की ये कहकर आलोचना करने लगे कि वो रविदास कबीर आदि संत कवियों की श्रेणी के नहीं हैं। कि वाल्मीकि ने शूद्रों के हित की कोई बात नहीं कही और रामायण मात्र शूद्र विरोधी राम का गुणगान है तथा इस प्रकार वाल्मीकि एक चाटुकार कवि हैं। मैं इस अनर्गल दृष्टि से सहमत नहीं हूँ। क्योंकि :-

    एक तो कल्पना और वास्तविक की तुलना नहीं की जा सकती। अतः वाल्मीकि और उल्लिखित संतों की तुलना व्यर्थ है। दूसरा, अयोध्या के सिंहासन पर बैठने के बाद राम व उनके भाइयों में उपजे अहंकार, राम राज्य में घुस आई पक्षपात पूर्ण अव्यवस्था और सीता के रूप में स्त्री के प्रति किये गए अन्याय के विरूद्ध वाल्मीकि ने राम के ही पुत्रों को खड़ा किया। कथा में कुछ भी सीधा नहीं कहा जाता अपितु प्रतीकात्मक स्तर की प्रधानता रहती है। शुद्र वानरों को अतिस्मर्थ रूप में दिखाना, सवर्णों के प्रतीक विलासी इन्द्र का मान भंग करवाना, इन्द्र के पुत्र जयंत को दंड दिलवाना इत्यादि क्रांतिकारी दृष्टियां हैं रामायण में। लेकिन सामान्य आदमी प्रतीक पकड़ने की क्षमता नहीं रखता, उसको सीधा-स्पष्ट चित्र चाहिये। काव्य और साहित्य को न समझ पाने वाले काव्य-भेद को नहीँ समझ पाते । इसलिये वो मात्र निषाद व शबरी प्रसंग ही देख पा रहे हैं क्योंकि ये सीधे-स्पष्ट हैं, समझने के लिये बुद्धि नहीं लगानी पड़ती।और क्या ये कहकर पल्ला झाला जा सकता है कि मात्र दो प्रसंग- निषाद तथा शबरी – ही तो उपलब्ध हैं वाल्मीकि रामायण में। संख्या छोड़िये, उपलब्ध तो हैं न। रविदास कबीर आदि 13वीं-14वीं शताब्दी में हुए अर्थात सभ्यता आरंभ के शताब्दियों बाद लेकिन उनसे 1500-2000 वर्ष पूर्व अपेक्षाकृत अधिक रूढ़ समाज में निषाद व शबरी तथा लव-कुश प्रसंग के अतिरिक्त एक अहंकारी राजा इन्द्र के विरुद्ध लिखना, क्षत्रिय राजा की शूद्र निषाद से मित्रता दिखाना, नाव में बैठने से मना करने वाले शूद्र केवट के आगे क्षत्रिय राम का विनम्र वंदन करवाना, दक्षिण के शूद्रों से मित्रता व सहायता लेना दिखाना, इत्यादि उस समय के अनुसार पर्याप्त क्रांतिकारी दृष्टि थी। जो ये कहते हैं कि शम्बूक वध पर वाल्मीकि कुछ नहीं बोले, राम की आलोचना नहीं की तो उनको यह समझना चाहिए कि भई ये वाल्मीकि ही तो हैं जिन्होंने राम द्वारा शम्बूक के अन्यायपूर्ण वध का चित्रण किया है। अब ऐसा तो नहीँ है न कि वाल्मीकि कथा के बीच ही कथा रोककर राम की आलोचना करने लगते। कथा कहने की ये शैली तब नहीं थी। और शम्बूक प्रसंग स्वयं ही राम व राम राज पर प्रश्न है। वाल्मीकि यदि चाटुकार होते तो न कहते ये प्रसंग। कवि का काम व्याख्या देना नहीं होता, कवि सीमित शब्दों में वस्तु स्थिति को बांधता है और पाठक की मेधा पर व्याख्या छोड़ देता है। वाल्मीकि रामायण बीजवपन है। आवश्यक नहीं कि क्रांति का आरंभ सदा शिखर से हो, अधिकांशत: क्रांति की कोंपलें अन्याय-अराजकता सिंचित बंजर भूमि में ही प्रस्फुटन प्राप्त करती हैं और शताब्दियां लग जाती हैं उसे वृक्ष बनने में । वाल्मीकि क्रांति के बीज थे, वृक्ष नहीं। प्रेरक थे, उसकी पूर्णता नहीं।

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